बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार के ‘पार्क संरक्षण संशोधन विधेयक, 2026’ को लेकर विवाद के बीच राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कथित तौर पर कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। सूत्रों के अनुसार राज्यपाल ने विधेयक से जुड़े कुछ मुद्दों पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगते हुए इसे वापस भेज दिया है। यह विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के लिए लोक भवन भेजा गया था। दूसरी ओर जनता के एक वर्ग की ओर से हुए कड़े विरोध के बाद राज्य सरकार पहले ही इसे वापस लेने का फैसला कर चुकी है और अब आपत्तियों पर विचार करते हुए संशोधित रूप में दोबारा पेश करने की योजना बना रही है।

सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल ने शुक्रवार को विधेयक सरकार को वापस भेजा और कुछ बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा। इससे पहले गुरुवार को ही सरकार ने विरोध को देखते हुए विधेयक वापस लेने का निर्णय किया था।

राज्यपाल ने विधेयक पर जताई चिंता

सूत्रों के अनुसार पार्क संरक्षण संशोधन विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के लिए लोक भवन भेजा गया था। विधेयक का अध्ययन करने के बाद राज्यपाल ने इसके कुछ प्रावधानों को लेकर चिंता जताई।

बताया जा रहा है कि राज्यपाल ने सीधे मंजूरी देने के बजाय सरकार से कुछ मुद्दों पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है। अब सरकार को उन सवालों और आपत्तियों पर जवाब देना होगा जो विधेयक को लेकर उठाए गए हैं।

हालांकि राज्यपाल की ओर से किन विशेष प्रावधानों पर आपत्ति जताई गई है, इसकी विस्तृत आधिकारिक जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है।

शुक्रवार को सरकार को वापस भेजा विधेयक

सूत्रों ने बताया कि शुक्रवार को विधेयक सरकार को वापस भेज दिया गया। इसके साथ कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण भी मांगा गया है।

राज्यपाल के इस कदम के बाद सरकार को विधेयक की समीक्षा करने का एक और अवसर मिल गया है। सरकार पहले ही इसे वापस लेने और बदलाव के बाद नए स्वरूप में पेश करने की योजना बना चुकी है।

ऐसे में अब जनता की आपत्तियों के साथ राज्यपाल की ओर से उठाए गए सवालों को भी संशोधन की प्रक्रिया में ध्यान में रखा जा सकता है।

जनता के विरोध के बाद सरकार का फैसला

पार्क संरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर विभिन्न स्तरों पर विरोध सामने आया था। लोगों की ओर से विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए गए और सरकार से इसे वापस लेने की मांग की गई।

लगातार बढ़ते विरोध के बाद सरकार ने गुरुवार को विधेयक वापस लेने का फैसला किया। सरकार ने संकेत दिया कि जनता की चिंताओं और आपत्तियों पर विचार करने के बाद आवश्यक बदलाव किए जाएंगे।

इसके बाद विधेयक को नए स्वरूप में दोबारा पेश किया जा सकता है। सरकार की कोशिश होगी कि संशोधित प्रस्ताव में उन मुद्दों का समाधान किया जाए जिनके कारण विरोध पैदा हुआ।

आपत्तियों पर विचार के बाद होगा बदलाव

सरकार की योजना विधेयक को पूरी तरह छोड़ने के बजाय इसमें जरूरी संशोधन करने की बताई जा रही है। इसके लिए विभिन्न पक्षों से सामने आई आपत्तियों का अध्ययन किया जाएगा।

पार्क और सार्वजनिक हरित क्षेत्र किसी भी बड़े शहर के पर्यावरण और नागरिक सुविधाओं के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए इनसे संबंधित कानूनों में बदलाव को लेकर नागरिक समूहों और पर्यावरण से जुड़े संगठनों की दिलचस्पी स्वाभाविक है।

सरकार के सामने अब ऐसा संशोधित प्रस्ताव तैयार करने की चुनौती होगी जिसमें प्रशासनिक जरूरतों और सार्वजनिक हरित क्षेत्रों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

नए सिरे से तैयार हो सकता है प्रस्ताव

विधेयक वापस लेने के फैसले के बाद संबंधित विभाग इसके प्रावधानों का नए सिरे से अध्ययन कर सकता है। जनता की आपत्तियों और राज्यपाल द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरण के आधार पर आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं।

यदि सरकार संशोधित विधेयक लाती है तो उसे फिर से निर्धारित विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसमें नए प्रस्ताव को तैयार करने से लेकर विधानसभा में पेश करने और आवश्यक मंजूरी हासिल करने की प्रक्रिया शामिल हो सकती है।

सरकार की ओर से यह भी देखा जा सकता है कि विवाद पैदा करने वाले प्रावधानों को हटाया जाए या उनकी भाषा में बदलाव किया जाए।

पार्कों के संरक्षण को लेकर बढ़ी बहस

विधेयक से जुड़े विवाद ने शहरी पार्कों और सार्वजनिक हरित क्षेत्रों के संरक्षण को लेकर बहस तेज कर दी है। तेजी से बढ़ते शहरों में जमीन की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर पार्क और खुले क्षेत्र पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शहरी इलाकों में पार्क न केवल हरियाली उपलब्ध कराते हैं बल्कि आम लोगों के लिए व्यायाम, मनोरंजन और सामाजिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण स्थान होते हैं।

इसी वजह से पार्कों से संबंधित नियमों में किसी भी बड़े बदलाव पर नागरिकों की नजर रहती है।

सरकार के अगले कदम पर नजर

राज्यपाल द्वारा कथित तौर पर विधेयक वापस भेजे जाने और सरकार द्वारा पहले ही इसे वापस लेने का फैसला किए जाने के बाद अब अगला कदम महत्वपूर्ण होगा।

सरकार को तय करना होगा कि प्रस्ताव में कितने व्यापक बदलाव किए जाएं। यदि जनता की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए नया विधेयक तैयार किया जाता है तो सरकार विभिन्न हितधारकों के साथ चर्चा भी कर सकती है।

इससे संशोधित विधेयक को लेकर भविष्य में पैदा होने वाले विवाद को कम करने में मदद मिल सकती है।

संशोधित रूप में फिर पेश करने की तैयारी

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार सरकार पार्क संरक्षण संशोधन विधेयक को मौजूदा स्वरूप में आगे नहीं बढ़ाना चाहती। लोगों की आपत्तियों पर विचार करने के बाद इसमें बदलाव किए जाएंगे और फिर इसे दोबारा पेश करने की योजना है।

राज्यपाल थावरचंद गहलोत की ओर से मांगे गए स्पष्टीकरण के बाद इस प्रक्रिया में कुछ अतिरिक्त बिंदु भी शामिल हो सकते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार संशोधित विधेयक में क्या बदलाव करती है और सार्वजनिक पार्कों के संरक्षण से जुड़ी चिंताओं को किस तरह संबोधित करती है।

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