कर्नाटक में शिवकुमार कैबिनेट विस्तार पर विवाद

Update: 2026-08-06 06:19 GMT

बेंगलुरु। कर्नाटक में उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की कैबिनेट में 19 नए मंत्रियों को शामिल किए जाने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मंत्रिमंडल विस्तार में पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और दलितों के समूह यानी ‘अहिंदा’ को खास महत्व दिया गया है। हालांकि, इस फैसले के बाद कांग्रेस के भीतर ही असंतोष की आवाजें उठने लगी हैं।

कई नेताओं ने मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं मिलने पर नाराजगी जताई है। कुछ विधायकों ने पार्टी नेतृत्व पर वफादार कार्यकर्ताओं और लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया है।

अहिंदा समीकरण पर जोर

शिवकुमार सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की गई है। पार्टी ने पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और दलित समुदायों को प्रतिनिधित्व देने पर ध्यान केंद्रित किया है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, कर्नाटक की राजनीति में अहिंदा वर्ग लंबे समय से एक महत्वपूर्ण वोट बैंक रहा है। कांग्रेस ने इस वर्ग को मजबूत संदेश देने के उद्देश्य से मंत्रिमंडल में इसे प्राथमिकता दी है।

हालांकि, इसी रणनीति के चलते कुछ क्षेत्रों के नेताओं में असंतोष बढ़ गया है।

कई जिलों को नहीं मिला प्रतिनिधित्व

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद कुछ जिलों के नेताओं ने सवाल उठाए हैं कि उनके क्षेत्रों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया गया।

बताया जा रहा है कि कुछ ऐसे जिले हैं जहां से कोई मंत्री शामिल नहीं किया गया। इनमें उडुपी को छोड़कर अन्य जिलों में कांग्रेस के पास विधानसभा की अच्छी खासी संख्या में सीटें हैं।

इन क्षेत्रों के विधायकों का कहना है कि पार्टी ने उनके समर्थन और चुनावी योगदान को नजरअंदाज किया है।

विधायकों ने जताई नाराजगी

कांग्रेस के कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि मंत्रिमंडल गठन में पार्टी के पुराने और समर्पित नेताओं को उचित महत्व नहीं मिला।

कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े नेताओं की जगह ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी गई जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

हालांकि, पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

इस्तीफे की धमकियों से बढ़ी चिंता

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद कुछ नेताओं की नाराजगी इतनी बढ़ गई कि इस्तीफे की धमकियों की खबरें भी सामने आईं।

कांग्रेस नेतृत्व के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि पार्टी सरकार को स्थिर रखने के साथ-साथ सभी क्षेत्रों और समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश कर रही है।

क्षेत्रीय संतुलन पर उठे सवाल

कर्नाटक जैसे बड़े राज्य में मंत्रिमंडल गठन के दौरान क्षेत्रीय संतुलन हमेशा एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है।

विधायकों का कहना है कि कुछ जिलों से लगातार समर्थन मिलने के बावजूद उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। इससे स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों में निराशा पैदा हो रही है।

कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती

कांग्रेस के सामने अब एक ओर सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर बढ़ रही नाराजगी को शांत करना भी जरूरी हो गया है।

अहिंदा वर्ग को मजबूत करने की रणनीति पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ ही पुराने नेताओं और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की मांगों को भी संतुलित करना होगा।

नेतृत्व कर रहा है स्थिति संभालने की कोशिश

सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व नाराज नेताओं से बातचीत कर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।

कांग्रेस चाहती है कि मंत्रिमंडल विस्तार के बाद उठे विवाद को जल्द खत्म किया जाए ताकि सरकार के कामकाज पर इसका असर न पड़े।

आने वाले दिनों में साफ होगी तस्वीर

फिलहाल कर्नाटक कांग्रेस में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अंदरूनी खींचतान जारी है। जहां सरकार इसे सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है, वहीं कुछ विधायक इसे राजनीतिक रूप से गलत फैसला मान रहे हैं।

अब नजर इस बात पर होगी कि पार्टी नेतृत्व नाराज नेताओं को कैसे मनाता है और क्या यह असंतोष आने वाले समय में किसी बड़े राजनीतिक संकट का रूप लेता है या नहीं।

Tags:    

Similar News