बेंगलुरु : 28 अक्टूबर 2026। कर्नाटक में वोटर आईडी कार्ड की छपाई से जुड़े टेंडर को लेकर नया राजनीतिक विवाद सामने आया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता आर. अशोक ने करीब 20 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का आरोप लगाते हुए टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस मामले में केवल एक बोलीदाता होने का मुद्दा उठाया है। हालांकि, कथित 20 करोड़ रुपये के घोटाले और अशोक के बयान के पूरे विवरण की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। उपलब्ध टेंडर रिकॉर्ड में एक बोलीदाता की जानकारी जरूर सामने आई है।
'सिर्फ एक ही टेंडर था', आर. अशोक ने उठाए सवाल
मामले को लेकर आर. अशोक की ओर से उठाया गया प्रमुख सवाल यह है कि वोटर आईडी कार्ड की छपाई जैसे महत्वपूर्ण काम में प्रतिस्पर्धा सीमित क्यों रही।उनके आरोप के अनुसार, इस प्रक्रिया में करीब 20 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता की आशंका है। उन्होंने टेंडर प्रक्रिया को लेकर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी निविदा में केवल एक बोलीदाता का होना अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। यह जांच का विषय हो सकता है कि संबंधित टेंडर की शर्तें क्या थीं, कितनी कंपनियां पात्र थीं और ठेका देते समय निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन हुआ या नहीं।फिलहाल इस विशेष मामले में भ्रष्टाचार साबित होने की कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।
वोटर आईडी कार्ड की छपाई के टेंडर में सामने आई जानकारी
सार्वजनिक टेंडर रिकॉर्ड के अनुसार, कर्नाटक राज्य निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2026 में राज्य मतदाता पहचान पत्र यानी स्टेट वोटर आइडेंटिटी कार्ड (SVIC) और संबंधित दस्तावेजों की छपाई के लिए निविदा जारी की थी।टेंडर संख्या KSEC/2026-27/SE0005/CALL-2 को 29 अप्रैल 2026 को प्रकाशित किया गया था। बोली जमा करने की अंतिम तारीख 6 मई निर्धारित की गई थीउपलब्ध रिकॉर्ड में इस निविदा के लिए एक बोलीदाता दर्ज है। संबंधित कंपनी का नाम अतिशय लिमिटेड है। टेंडर रिकॉर्ड में 3 अक्टूबर 2026 को कॉन्ट्रैक्ट अवार्ड की प्रविष्टि भी दिखाई देती है।यह जानकारी टेंडर प्रक्रिया से संबंधित सार्वजनिक दस्तावेजों में उपलब्ध है। हालांकि, यह स्थापित नहीं हो सका है कि आर. अशोक का आरोप निश्चित रूप से इसी निविदा से संबंधित है।
अतिशय लिमिटेड को मिला था वोटर आईडी कार्ड छपाई का काम
कंपनी की ओर से मई 2026 में जारी जानकारी के अनुसार, अतिशय लिमिटेड को गुंडल बिजनेस प्राइवेट लिमिटेड के साथ संयुक्त रूप से कर्नाटक राज्य निर्वाचन आयोग से वोटर आईडी कार्ड की छपाई का काम मिला था।यह कार्य ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी के अंतर्गत आने वाले पांच नगर निगमों से संबंधित है।कंपनी के मुताबिक, यह दर-आधारित अनुबंध है, जिसके तहत भुगतान वास्तविक कार्यादेशों और किए गए काम की मात्रा पर निर्भर करेगा।इस अनुबंध की अवधि मई 2027 तक बताई गई है। निविदा की शर्तों के अनुसार इसे आगे छह महीने तक बढ़ाए जाने का प्रावधान भी है।महत्वपूर्ण बात यह है कि कंपनी ने अपने खुलासे में इस अनुबंध की कोई निश्चित कुल धनराशि नहीं बताई थी। इसलिए इसे स्वतंत्र रूप से 20 करोड़ रुपये का अनुबंध घोषित करना सही नहीं होगा।
टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों जरूरी?
सरकारी खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को महत्वपूर्ण माना जाता है। निविदा का उद्देश्य पात्र कंपनियों को समान अवसर देना और सार्वजनिक धन का उचित उपयोग सुनिश्चित करना होता है।यदि किसी प्रक्रिया में केवल एक कंपनी भाग लेती है, तो संबंधित विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि निविदा की शर्तें निष्पक्ष थीं और निर्धारित खरीद नियमों का पालन किया गया।ऐसे मामलों में यह जांचना महत्वपूर्ण होता है कि टेंडर की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी या नहीं, पात्रता की शर्तें उचित थीं या नहीं और निर्धारित दरों का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया।किसी तरह की अनियमितता का निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
कर्नाटक में चुनावी प्रक्रिया को लेकर पहले से विवाद
कर्नाटक में मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर हाल के दिनों में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बढ़े हैं।कांग्रेस ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने से संबंधित प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे।वहीं, आर. अशोक ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि मतदाता सूची में संशोधन निर्वाचन आयोग के निर्धारित नियमों के अनुसार होना चाहिए।उन्होंने अक्टूबर में दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि मतदाताओं के नाम हटाने से संबंधित फॉर्म-7 के मामलों की वास्तविकता चुनाव अधिकारियों को निर्धारित करनी चाहिए।ऐसे राजनीतिक माहौल में वोटर आईडी कार्ड की छपाई से संबंधित टेंडर पर उठे सवालों ने चुनाव प्रबंधन से जुड़े प्रशासनिक मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है।
सरकारी धन के इस्तेमाल पर जवाबदेही की मांग
आर. अशोक कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के खिलाफ विभिन्न सरकारी टेंडरों और योजनाओं में कथित अनियमितताओं के मुद्दे लगातार उठाते रहे हैं।हाल ही में उन्होंने ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी के कचरा प्रबंधन से जुड़े 133 करोड़ रुपये के टेंडरों में भी अनियमितता का आरोप लगाया था।उन्होंने उस मामले में कंपनी की पात्रता, सुरक्षा राशि और वित्त विभाग की आपत्तियों को लेकर सवाल उठाए तथा लोकायुक्त जांच की मांग की थी।हालांकि, कचरा प्रबंधन का वह मामला वोटर आईडी कार्ड की छपाई से जुड़े मौजूदा आरोप से अलग है।
क्या कहती है सरकार और निर्वाचन आयोग की स्थिति?
वोटर आईडी कार्ड की छपाई से संबंधित कथित 20 करोड़ रुपये के घोटाले पर कर्नाटक सरकार या राज्य निर्वाचन आयोग का कोई विशिष्ट आधिकारिक जवाब उपलब्ध नहीं हो सका है।यह भी स्पष्ट नहीं है कि आर. अशोक के आरोप को लेकर किसी जांच एजेंसी ने औपचारिक जांच शुरू की है या नहीं।ऐसे में किसी सरकारी अधिकारी, कंपनी या राजनीतिक दल को दोषी ठहराना जल्दबाजी होगी।संबंधित विभाग की ओर से निविदा की पात्रता शर्तों, बोलीदाताओं की संख्या, भुगतान और कार्यादेशों का विस्तृत विवरण सामने आने पर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
आरोपों की जांच से स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति
कर्नाटक में वोटर आईडी कार्ड की छपाई से जुड़ी निविदा को लेकर उठे सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता और सार्वजनिक धन के उपयोग से संबंधित हैं।उपलब्ध रिकॉर्ड में एक बोलीदाता की भागीदारी दर्ज होने के बावजूद इससे किसी घोटाले की पुष्टि नहीं होती।अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस 20 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता का आरोप लगाया गया है, उसका आधार क्या है और क्या संबंधित दस्तावेज किसी वित्तीय नुकसान की पुष्टि करते हैं।मामले में वास्तविक स्थिति आधिकारिक स्पष्टीकरण, दस्तावेजों की जांच और संभावित जांच एजेंसी के निष्कर्षों से ही स्पष्ट हो पाएगी।
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