Himachal हिमाचल प्रदेश सरकार ने 'हिमाचल प्रदेश नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (संशोधन) नियम, 2026' को अधिसूचित किया है। इससे राज्य में सिर्फ़ मेडिकल और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए भांग की नियंत्रित खेती का रास्ता साफ़ हो गया है। गुरुवार को राजपत्र (ई-गजट) में अधिसूचना प्रकाशित होने के साथ ही ये नियम लागू हो गए। राज्य कर और आबकारी सचिव द्वारा जारी इन संशोधनों के तहत, भांग-आधारित उत्पादों की खेती, भंडारण, परिवहन, प्रोसेसिंग और निर्माण को नियंत्रित करने के लिए एक व्यापक नियम-कानून का ढांचा तैयार किया गया है।
नई व्यवस्था के तहत, भांग की खेती की अनुमति केवल कड़ी शर्तों के साथ दी जाएगी, ताकि इसके दुरुपयोग को रोका जा सके और पूरी तरह से ट्रेसिबिलिटी (उत्पाद की जानकारी का पता लगाने की क्षमता) सुनिश्चित की जा सके। किसानों को केवल अधिकृत आपूर्तिकर्ताओं से ही स्थानीय प्रमाणित बीज लेने होंगे। बीजों के साथ विश्लेषण का प्रमाण पत्र होना ज़रूरी है, जिसमें कैनाबिनोइड की मात्रा बताई गई हो। नियमों के अनुसार, खेती केवल कम से कम तीन एकड़ की भौगोलिक रूप से जुड़ी हुई ज़मीन पर ही की जा सकती है। हालाँकि, न्यूनतम क्षेत्र की यह शर्त वैज्ञानिक अनुसंधान में लगे सरकारी विभागों, अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों पर लागू नहीं होगी।
खुले खेतों में खेती पर रोक लगा दी गई है। भांग को केवल पूरी तरह से घेरे गए परिसर के भीतर ग्रीनहाउस या पॉलीहाउस जैसे बंद और नियंत्रित वातावरण में ही उगाया जा सकता है। लाइसेंस प्राप्त खेती वाली जगहों और गोदामों की जियो-टैगिंग करनी होगी। साथ ही, सुरक्षा के उपाय जैसे कि आने-जाने का एक ही रास्ता, CCTV निगरानी, सुरक्षित लॉकिंग सिस्टम और आने वाले लोगों का पूरा रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा।
किसानों को फसल कटाई शुरू होने से पहले उपज को सुरक्षित रूप से रखने के लिए एक गोदाम भी बनाना होगा। उन्हें खेती, कटाई, उपज के वज़न और लाइसेंस प्राप्त परिसर में किसी भी अनधिकृत प्रवेश की कोशिश या वास्तविक प्रवेश का विस्तृत रिकॉर्ड रखना होगा। नियमों में अधिकृत बीज आपूर्तिकर्ताओं के लिए लाइसेंस का प्रावधान भी है। ऐसे आपूर्तिकर्ताओं को लाइसेंस प्राप्त किसानों को भांग के बीज खरीदने, स्टोर करने और सप्लाई करने के लिए आबकारी कलेक्टर से लाइसेंस लेना होगा। साथ ही, भांग की उपज को लाने-ले जाने के लिए परिवहन परमिट भी लेना होगा।
भांग-आधारित उत्पादों की प्रोसेसिंग और निर्माण के लिए अलग से लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा। मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने के लिए कंपनियों को कम से कम 100 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को सालाना टर्नओवर पर 3 प्रतिशत राज्य उपकर (सेस) देना होगा, जिसमें 2 प्रतिशत मिल्क सेस और 1 प्रतिशत पर्यावरण सेस शामिल होगा। नोटिफिकेशन में यह भी साफ़ किया गया है कि नई पॉलिसी के तहत उगाए गए भांग का इस्तेमाल तय दायरे से बाहर मनोरंजन या कमर्शियल कामों के लिए नहीं किया जा सकता। लाइसेंस और परमिट रखने वालों को भांग के पौधे के किसी भी हिस्से का सेवन करने, बेचने या उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की इजाज़त नहीं होगी, सिवाय उन कामों के लिए जिनकी मंज़ूरी मेडिकल और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए दी गई है। इन नियमों के नोटिफिकेशन के साथ, हिमाचल प्रदेश ने भांग के एक कड़ाई से रेगुलेटेड उद्योग के लिए कानूनी ढांचा औपचारिक रूप से लागू कर दिया है। इसमें आर्थिक मौकों और भांग के गलत इस्तेमाल या डायवर्जन को रोकने के लिए कड़े सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन बनाया गया है।