शिमला। हिमाचल प्रदेश में खनन कार्यों को बेहतर तरीके से संचालित करने के लिए अलग से खनन विभाग के गठन की तैयारी की जा रही है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने गुरुवार को विधानसभा में जानकारी देते हुए कहा कि वर्तमान में खनन से जुड़े कार्य उद्योग विभाग के खनन विंग के माध्यम से किए जा रहे हैं, लेकिन काम का दबाव अधिक होने के कारण अलग विभाग बनाने पर विचार किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वतंत्र खनन विभाग बनने के बाद राज्य में खनन गतिविधियों को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी तरीके से संचालित किया जा सकेगा। इससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि राजस्व में भी बढ़ोतरी की संभावना है। उन्होंने अनुमान जताया कि बेहतर प्रबंधन के माध्यम से राज्य को खनन क्षेत्र से करीब 3000 करोड़ रुपये तक की आय हो सकती है।

सुक्खू विधानसभा में विधायक सुरेंद्र शौरी के मूल प्रश्न और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर, विधायक बिक्रम ठाकुर तथा राकेश जम्वाल के प्रतिपूरक सवालों का जवाब दे रहे थे। इस दौरान उन्होंने राज्य में खनन व्यवस्था, नदियों में बढ़ती सिल्ट की समस्या और ड्रेजिंग कार्यों को लेकर सरकार की योजना की जानकारी दी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि हिमाचल की नदियों में सिल्ट जमा होने की समस्या लगातार बढ़ रही है। इससे नदी की जलधारण क्षमता प्रभावित होती है और कई बार बाढ़ जैसी स्थिति का खतरा भी बढ़ जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने ड्रेजिंग कार्यों को शुरू किया है।

उन्होंने कहा कि पहले ड्रेजिंग से जुड़े कुछ कार्य वन विभाग को सौंपे गए थे। अब इन कार्यों को वन निगम के माध्यम से करवाया जा रहा है। हालांकि, अलग खनन विभाग बनने के बाद इन सभी कार्यों को एक ही विभाग के माध्यम से संचालित किया जा सकेगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि खनन क्षेत्र में पारदर्शिता और प्रभावी नियंत्रण के लिए संस्थागत बदलाव जरूरी हैं। अलग विभाग बनने से अवैध खनन पर निगरानी बढ़ाई जा सकेगी और खनिज संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा।

हिमाचल प्रदेश में नदियों और खड्डों से निकलने वाले खनिजों का उपयोग निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। वर्तमान व्यवस्था में खनन से जुड़े कई काम उद्योग विभाग के अंतर्गत आते हैं। सरकार का मानना है कि अलग विभाग बनने से इस क्षेत्र में काम करने की गति बढ़ेगी।

विधानसभा में चर्चा के दौरान विपक्ष की ओर से भी खनन व्यवस्था और राजस्व बढ़ाने को लेकर सवाल उठाए गए। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग जनहित और विकास कार्यों के लिए करना चाहती है।

उन्होंने यह भी कहा कि खनन गतिविधियों में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। सरकार का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और नियमों के अनुसार खनन व्यवस्था तैयार करना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में खनन गतिविधियों को नियंत्रित तरीके से संचालित करना चुनौतीपूर्ण है। यहां नदियों और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनानी पड़ती हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि नया खनन विभाग बनने से राज्य में खनिज संसाधनों के प्रबंधन को नई दिशा मिलेगी। विभाग के पास पर्याप्त अधिकार और जिम्मेदारी होने से खनन से जुड़े मामलों का तेजी से समाधान किया जा सकेगा।

सरकार की योजना है कि खनन क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व का उपयोग प्रदेश के विकास कार्यों में किया जाए। इसके साथ ही अवैध खनन रोकने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।

हिमाचल में लंबे समय से अवैध खनन और नदी तल में बढ़ती सिल्ट की समस्या चर्चा में रही है। ऐसे में अलग विभाग के गठन को सरकार एक सुधारात्मक कदम के रूप में देख रही है।

फिलहाल सरकार अलग खनन विभाग के गठन को लेकर प्रक्रिया और संभावनाओं पर मंथन कर रही है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो राज्य में खनन से जुड़े सभी कार्य एक स्वतंत्र विभाग के अधीन आ जाएंगे।

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद प्रदेश में खनन व्यवस्था को लेकर नई उम्मीदें जगी हैं। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी, अवैध गतिविधियों पर रोक लगेगी और राज्य की आय में भी इजाफा होगा।

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