मेकाहारा अस्पताल में दो प्रसूताओं को एक ही बेड पर भर्ती, हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

छग

Update: 2025-10-30 14:18 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। राजधानी रायपुर के डॉ. बी.आर. अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल (मेकाहारा) के गायनिक वार्ड में दो प्रसूताओं को एक ही बेड पर भर्ती किए जाने की घटना ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना के बाद बिलासपुर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि “अगर राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की यह स्थिति है तो बाकी जिलों में क्या हाल होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।” अदालत ने इस घटना को मानव गरिमा के खिलाफ बताते हुए कहा कि सरकार को तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) से 6 नवंबर तक शपथपत्र में जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की घटनाएं न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती हैं, बल्कि राज्य की चिकित्सा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को उजागर करती हैं। घटना के बाद प्रदेशभर में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बहस छिड़ गई है। यह मामला तब सामने आया जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें रायपुर मेकाहारा अस्पताल के गायनिक वार्ड में दो प्रसूताएं एक ही बेड पर पड़ी दिखाई दे रही थीं। दोनों के बीच नवजात बच्चे भी मौजूद थे। वीडियो सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया और अब न्यायपालिका ने भी सख्त रुख अपनाया है।

सरकारी सिस्टम पर उठे सवाल
इस घटना ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राजधानी रायपुर का मेकाहारा अस्पताल प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल माना जाता है, जहां रोजाना सैकड़ों मरीज भर्ती होते हैं। ऐसे में दो प्रसूताओं को एक ही बेड पर रखने जैसी घटना न केवल अस्वीकार्य है बल्कि संक्रमण फैलने का भी गंभीर खतरा पैदा करती है। जनता और सामाजिक संगठनों ने इस घटना को लेकर सरकार की नीतियों और स्वास्थ्य प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं।

लोगों का कहना है कि जब राजधानी के प्रमुख अस्पताल का यह हाल है, तो ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के अस्पतालों में मरीजों की स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों का कहना है कि अस्पताल में बढ़ते मरीजों के दबाव और सीमित संसाधनों के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई। लेकिन अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद प्रशासनिक स्तर पर बड़ी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में इस तरह की अमानवीय घटनाएं दोबारा न हों और मरीजों को सम्मानजनक एवं सुरक्षित इलाज का अधिकार मिले।
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