दत्तक पुत्र होने का प्रमाण नहीं दे पाया युवक, अनुकंपा नियुक्ति का नहीं मिलेगा लाभ
छग
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति को दत्तक पुत्र घोषित करने के निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि गोद लेने की प्रक्रिया में सबसे जरूरी ‘देने-लेने की रस्म’ का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे दत्तक संबंध कानूनी रूप से सिद्ध नहीं हो सका।
न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू की एकलपीठ ने रेलवे प्रशासन की अपील पर सुनवाई की। यह मामला एक रेलवे कर्मचारी राव से जुड़ा था, जिनकी 2001 में मृत्यु हो गई थी। संबंधित व्यक्ति ने खुद को उनका दत्तक पुत्र बताते हुए अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिस गोदनामे के आधार पर दावा किया जा रहा है, वह कथित गोद लेने की तारीख के लगभग 22 साल बाद तैयार और पंजीकृत किया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, गोद लेने की बात मार्च 1976 की बताई गई, जबकि गोदनामा फरवरी 1998 में रजिस्टर्ड हुआ। कोर्ट ने इसे संदेहास्पद मानते हुए कहा कि यह दस्तावेज गोद लेने के तत्काल बाद तैयार नहीं किया गया था, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।
सुनवाई के दौरान पेश गवाहों के बयान भी स्पष्ट नहीं थे। किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि गोद लेने की रस्म कहां हुई और किन लोगों की मौजूदगी में यह प्रक्रिया पूरी हुई। यहां तक कि गवाहों के बयानों में यह भी विरोधाभास था कि यह घटना किस मौसम में हुई थी। कोर्ट ने माना कि ऐसे कमजोर और अस्पष्ट साक्ष्यों के आधार पर दत्तक संबंध को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हालांकि संबंधित व्यक्ति ने दावा किया था कि वह बचपन से ही कथित दत्तक माता-पिता के साथ रह रहा था और उसे उनके द्वारा भविष्य निधि और बीमा में नामित भी किया गया था। इसके बावजूद कोर्ट ने कहा कि केवल साथ रहना या नामांकन होना, दत्तक संबंध का कानूनी प्रमाण नहीं बनता, जब तक कि विधिसम्मत प्रक्रिया पूरी न हो।
कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट ने बिना ठोस साक्ष्यों के व्यक्ति को दत्तक पुत्र घोषित कर दिया, जो कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है।