रायपुर पुलिस की ट्रांसफर नीति पर उठे सवाल, सालों से एक ही थाने में जमे है कई पुलिसकर्मी
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Raipur. रायपुर। राजधानी रायपुर में पुलिस विभाग द्वारा हाल ही में जारी तबादला सूची के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। अपराधों पर नियंत्रण और वर्षों से एक ही थाने में जमे अधिकारियों–कर्मचारियों को हटाने के उद्देश्य से यह प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन शहर के कई थाना क्षेत्रों में आज भी ऐसे पुलिसकर्मी मौजूद हैं, जिनकी पकड़ वर्षों से बनी हुई है। इससे न केवल तबादला नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं, बल्कि पुलिस–अपराधी गठजोड़ की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार, हालिया तबादलों के पीछे मंशा यह थी कि लंबे समय से एक ही जगह तैनात पुलिसकर्मियों को हटाकर कानून-व्यवस्था में नई ऊर्जा लाई जाए। खुद रायपुर पुलिस कप्तान लाल उम्मेद सिंह ने स्पष्ट संदेश दिया था कि किसी भी थाने या चौकी में वर्षों से जमे अधिकारियों को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बावजूद इसके, कई थानों में सब इंस्पेक्टर (एसआई), असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर (एएसआई), प्रधान आरक्षक, आरक्षक और यहां तक कि नगर सैनिक भी वर्षों से एक ही क्षेत्र में जमे हुए हैं।
28/06/2025 से निकले आदेश के बाद भी कई पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों का थाना नहीं बदला
25 साल से रायपुर शहर में जमे ASI का मामला
शहर के कोतवाली थाना को लेकर सबसे चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, एक एएसआई ऐसा है जो पिछले करीब 25 वर्षों से रायपुर शहर से बाहर नहीं गया। ट्रांसफर के नाम पर वह सिर्फ कोतवाली, पुरानी बस्ती, गंज और टिकरापारा थाना क्षेत्रों के बीच ही घूमता रहा। नियमों के अनुसार, किसी भी पुलिसकर्मी को सीमित अवधि के बाद दूसरे जिले या क्षेत्र में भेजा जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में नियम केवल कागजों तक ही सीमित रह गए। इसी तरह राजधानी से सटे आरंग में भी एक नगर सैनिक वर्षों से एक ही थाने में जमे होने की बात सामने आ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उसकी पकड़ इतनी मजबूत है कि वह थाना स्तर पर प्रभावशाली भूमिका निभाता है।
लंबे समय की तैनाती और गहरी पैठ
किसी भी पुलिसकर्मी का लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में रहना स्वाभाविक रूप से स्थानीय नेटवर्क बनाने में मदद करता है। सूत्रों का कहना है कि यही नेटवर्क बाद में अवैध कारोबारियों और अपराधियों से सांठगांठ का आधार बन जाता है। रायपुर शहर और आसपास के इलाकों में सट्टा, गांजा, अवैध शराब, जुआ और रेत उत्खनन जैसे कारोबार खुलेआम चलने की शिकायतें लंबे समय से मिलती रही हैं। सवाल यह उठता है कि पुलिस की मौजूदगी के बावजूद ये धंधे फल-फूल कैसे रहे हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि कुछ पुलिसकर्मी नियमित रूप से इन अवैध कारोबारियों से हफ्ता वसूली करते हैं। बदले में उन्हें कार्रवाई से संरक्षण दिया जाता है। यही कारण है कि कई बार शिकायतों के बावजूद मौके पर कार्रवाई नहीं होती या फिर मामूली दिखावटी कार्रवाई कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
तबादला आदेश बनाम हकीकत
पुलिस कप्तान द्वारा जारी तबादला आदेशों में स्पष्ट किया गया था कि लंबे समय से एक ही थाने में पदस्थ कर्मियों को हटाकर अन्य स्थानों पर भेजा जाएगा। उद्देश्य साफ था- अपराध नियंत्रण, निष्पक्ष पुलिसिंग और जनता का भरोसा बहाल करना। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि कई पुलिस अधिकारी 5 से 10 सालों से एक ही थाने में जमे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, इनमें से कई अधिकारी न केवल अपराध जगत बल्कि स्थानीय राजनीतिक और आर्थिक नेटवर्क से भी जुड़े हुए हैं। यही वजह मानी जा रही है कि तबादला सूची जारी होने के बावजूद वे किसी न किसी तरह उसी थाने या नजदीकी क्षेत्र में पदस्थ बने रहते हैं। कुछ मामलों में तो ट्रांसफर के आदेश आने के बाद भी महीनों तक अमल नहीं होता।
अपराधियों से संरक्षण के गंभीर आरोप
शहर के कई थाना क्षेत्रों में यह आम चर्चा है कि सट्टा, गांजा और अवैध शराब के ठिकाने पुलिस की जानकारी में होते हैं। इसके बावजूद कार्रवाई न होना पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। सूत्रों का दावा है कि कुछ पुलिसकर्मी हर महीने मोटी रकम वसूलते हैं और बदले में अपराधियों को ‘सुरक्षा’ प्रदान करते हैं। यही कारण है कि अपराधी बेखौफ होकर अपने धंधे चलाते हैं।
जनता में बढ़ता असंतोष
पुलिस पर लगे इन आरोपों से आम जनता में गहरी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि जब कानून के रक्षक ही कानून तोड़ने वालों के साथ खड़े नजर आएंगे, तो आम नागरिक की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। राजधानी में चोरी, लूट, नशे का कारोबार और सट्टेबाजी की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इससे पुलिस पर भरोसा कमजोर होता जा रहा है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि ट्रांसफर नीति का सख्ती से पालन किया जाए और वर्षों से जमे अधिकारियों को हटाया जाए, तो अपराध पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। लेकिन जब तक आदेश केवल कागजों में सीमित रहेंगे, तब तक स्थिति में सुधार की उम्मीद कम है।
नगर सैनिकों पर भी उठे सवाल
आरंग और आसपास के ग्रामीण इलाकों में नगर सैनिकों की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ नगर सैनिक सालों से एक ही थाने में तैनात हैं और उनका प्रभाव इतना बढ़ गया है कि थाना प्रभारी भी कई मामलों में उनके बिना कार्रवाई करने से हिचकते हैं। आरोप है कि उनकी शह पर नशे का कारोबार, अवैध शराब बिक्री, जुआ-सट्टा और रेत उत्खनन जैसे धंधे फल-फूल रहे हैं। नगर सैनिकों की मूल भूमिका पुलिस को सहयोग देने की होती है, लेकिन यदि वही अवैध गतिविधियों का संरक्षण करने लगें तो यह कानून-व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। जानकारों का कहना है कि इससे न केवल राजस्व का नुकसान हो रहा है, बल्कि क्षेत्र में आपराधिक घटनाओं को भी बढ़ावा मिल रहा है।
जूनियर स्टाफ में असंतोष
लंबे समय से जमे अधिकारियों के कारण विभाग के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है। कई जूनियर अधिकारी और कर्मचारी चाहते हैं कि ट्रांसफर नियमों का निष्पक्ष रूप से पालन हो। उनका कहना है कि जब कुछ चुनिंदा अधिकारी वर्षों तक एक ही जगह टिके रहते हैं, तो बाकी कर्मचारियों को न तो समान अवसर मिलते हैं और न ही निष्पक्ष माहौल।
क्या बदलेगी तस्वीर?
अब सवाल यह है कि क्या रायपुर पुलिस में ट्रांसफर नीति वास्तव में लागू हो पाएगी या फिर यह भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी। जनता और विभाग के भीतर से बढ़ते दबाव को देखते हुए पुलिस कप्तान के सामने चुनौती बड़ी है। यदि वर्षों से जमे अधिकारियों को हटाकर निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाती है, तो राजधानी में अपराध नियंत्रण की दिशा में यह बड़ा कदम साबित हो सकता है। फिलहाल, रायपुर में पुलिस–अपराधी गठजोड़, तबादला नीति की अनदेखी और जनता के भरोसे के संकट ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पर कब और कितना सख्त कदम उठाता है।