बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कोटवारों को सेवाभूमि पर नहीं मिलेगा मालिकाना हक
छग
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की पूर्णपीठ ने कोटवारों की सेवा भूमि पर मालिकाना हक को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल और जस्टिस बीडी गुरु की पूर्णपीठ ने स्पष्ट किया है कि कोटवार या उनके उत्तराधिकारी सेवा भूमि पर भूमि स्वामी अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते हैं। हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि कोटवार का पद एक सेवा या रोजगार से जुड़ा पद है। उन्हें जो भूमि दी जाती थी, वह ग्राम सेवा के बदले आजीविका चलाने के उद्देश्य से दी गई थी। यह भूमि व्यक्तिगत स्वामित्व की श्रेणी में नहीं आती है। इसलिए कोटवारों या उनके परिवार के सदस्यों को इस भूमि पर मालिकाना हक नहीं दिया जा सकता।
यह मामला कवर्धा जिले के गंडईकला निवासी गजेंद्र दास और जरहतटोला निवासी सुकृत दास से जुड़ा हुआ था। दोनों याचिकाकर्ता पूर्व कोटवारों के उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि उनके पूर्वजों को मालगुजारों और जमींदारों द्वारा गांव की सेवा के बदले दी गई भूमि पर उन्हें भूमि स्वामी अधिकार प्रदान किया जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अंकित पांडे ने तर्क दिया कि मध्यप्रदेश जमींदारी उन्मूलन अधिनियम 1950 की धारा 45(3) के तहत सेवा के बदले भूमि पर कब्जा रखने वाले व्यक्ति मौरूसी कृषक बन जाते हैं। साथ ही भू-राजस्व संहिता की धारा 190 के तहत उन्हें भूमि स्वामी अधिकार प्राप्त होने का दावा किया गया। वहीं राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने कोर्ट के सामने पक्ष रखा कि कोटवार एक ग्राम सेवक होता है।
जमींदारी उन्मूलन अधिनियम 1950 लागू होने के बाद मालगुजारों और जमींदारों के सभी अधिकार राज्य सरकार में निहित हो गए थे। कोटवारों को दी गई भूमि केवल सेवा अवधि तक उपयोग के लिए होती है, जिससे वे अपने जीवन-यापन की व्यवस्था कर सकें। गौरतलब है कि इस मामले में हाईकोर्ट की दो अलग-अलग डिवीजन बेंच के फैसलों में अंतर था। विजय दास मानिकपुरी मामले में वर्ष 2005 में कोटवारों को सेवा भूमि पर भूमि स्वामी अधिकार देने की बात कही गई थी। वहीं गंभीर दास पनिका मामले में वर्ष 2018 में डिवीजन बेंच ने कहा था कि कोटवार की सेवा भूमि राज्य सरकार की संपत्ति है और उस पर निजी मालिकाना हक नहीं मिल सकता। दोनों फैसलों में विरोधाभास होने के कारण यह कानूनी प्रश्न बड़ी पीठ के समक्ष भेजा गया था। इसके बाद चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पूर्णपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुनाया।
पूर्णपीठ ने 28 पृष्ठों के आदेश में कहा कि वर्ष 1950 में मालगुजारी व्यवस्था समाप्त होने के बाद कोटवार राज्य शासन के कर्मचारी या सेवक के रूप में माने गए। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 183 के अनुसार कोटवार के पद से हटने, इस्तीफा देने या मृत्यु होने की स्थिति में सेवा भूमि अगले नियुक्त कोटवार को हस्तांतरित हो जाती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा भूमि को बेचा नहीं जा सकता, दान नहीं किया जा सकता और न ही इसका उपयोग गैर-कृषि कार्यों के लिए किया जा सकता है। यह भूमि केवल कोटवार की सेवा से जुड़ी हुई है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विजय दास मानिकपुरी मामले में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा 3 और भू-राजस्व संहिता की धारा 183 पर उचित विचार नहीं किया गया था। इसलिए उस फैसले को सही कानून की दृष्टि से मान्य नहीं माना जा सकता। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि छत्तीसगढ़ में कोटवारों को दी गई सेवा भूमि पर उन्हें या उनके उत्तराधिकारियों को भूमि स्वामी अधिकार नहीं मिलेगा। जमींदारी और मालगुजारी व्यवस्था समाप्त होने के बाद ऐसी भूमि राज्य सरकार के अधीन मानी जाएगी और इसका उपयोग केवल कोटवार सेवा व्यवस्था के तहत ही किया जा सकेगा।