हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बच्ची से दुष्कर्म-हत्या के आरोपी की सजा को रखा बरकरार

छग

Update: 2026-04-10 10:46 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 9 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म और उसकी हत्या के दोषी को दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यदि DNA प्रोफाइलिंग और मेडिकल रिपोर्ट जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य विश्वसनीय और विधिवत एकत्र किए गए हों, तो ‘लास्ट सीन थ्योरी’ पूरी तरह स्थापित न होने पर भी दोषसिद्धि का आधार बन सकते हैं। यह फैसला चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया।
यह मामला आरोपी बबलू कलमुम द्वारा दायर आपराधिक अपील से जुड़ा था, जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने 22 दिसंबर 2022 को उसे आईपीसी की धारा 302, 376(AB) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया है। मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, 13 जनवरी 2020 को 9 वर्षीय बच्ची बाजार जाने के लिए घर से निकली थी। दादी ने उसे अकेले जाने से मना किया था, लेकिन आरोपी ने बच्ची को सुरक्षित वापस लाने का भरोसा देकर उसे अपने साथ ले गया। इसके बाद बच्ची लापता हो गई और बाद में उसका शव बरामद हुआ। परिजनों ने स्कूल यूनिफॉर्म और कपड़ों के आधार पर उसकी पहचान की थी।
अभियोजन पक्ष ने बताया कि जांच के दौरान एकत्र किए गए जैविक नमूनों और DNA परीक्षण में आरोपी की संलिप्तता साबित हुई। मेडिकल रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हुआ कि बच्ची की मौत गला घोंटने (strangulation) के कारण हुई थी और यह हत्या का मामला था। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और अभियोजन साक्ष्यों की श्रृंखला को जोड़ने में विफल रहा है। वकील ने यह भी कहा कि केवल DNA रिपोर्ट के आधार पर दोषसिद्धि सुरक्षित नहीं है और आरोपी को झूठा फंसाया गया है।
वहीं राज्य सरकार ने तर्क दिया कि दादी की गवाही से ‘लास्ट सीन थ्योरी’ स्थापित होती है और DNA रिपोर्ट ने वैज्ञानिक रूप से आरोपी की भूमिका को साबित किया है। अदालत ने इस दलील को स्वीकार किया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आंगनवाड़ी रिकॉर्ड (Ex.P/15C) को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि बच्ची की जन्म तिथि 6 मार्च 2010 दर्ज है, जिससे घटना के समय उसकी उम्र लगभग 9 वर्ष 10 महीने थी। अदालत ने कहा कि सरकारी रिकॉर्ड को तब तक सही माना जाता है जब तक उसे ठोस साक्ष्यों से चुनौती न दी जाए।
अदालत ने कहा कि DNA प्रोफाइलिंग इस मामले में “सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक साक्ष्य” है। पीड़िता के शरीर से मिले जैविक नमूनों का आरोपी के DNA से मिलान हुआ, जो वैज्ञानिक रूप से उसकी संलिप्तता साबित करता है। कोर्ट ने कहा कि DNA साक्ष्य अत्यंत विश्वसनीय होता है और सही तरीके से संग्रहित होने पर लगभग निर्णायक प्रमाण देता है। इसके साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि बच्ची की मृत्यु गला घोंटने से हुई थी, जो हत्या की श्रेणी में आता है। अदालत ने एक ग्रामीण गवाह की गवाही को भी स्वीकार किया, जिसमें बताया गया था कि आरोपी ने ग्रामीणों के सामने अपराध स्वीकार किया था।
हाईकोर्ट ने शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला इतनी मजबूत होनी चाहिए कि आरोपी की बेगुनाही की कोई संभावना न बचे। अदालत ने माना कि इस मामले में सभी साक्ष्य मिलकर एक स्पष्ट और मजबूत कड़ी बनाते हैं। अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे आरोपी का अपराध साबित किया है। वैज्ञानिक साक्ष्य, मेडिकल रिपोर्ट और गवाहियों ने मिलकर दोषसिद्धि को मजबूत किया है। इसके साथ ही अदालत ने अपील को खारिज करते हुए उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
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