Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी और द्विविवाह के आरोपों का सामना कर रही एक महिला को बड़ी राहत दी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने महिला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अपनी वैवाहिक स्थिति से जुड़ी किसी जानकारी का खुलासा नहीं करना अपने आप में धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता। धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए छल और बेईमानी के साथ किसी व्यक्ति को संपत्ति या धन देने अथवा किसी कार्य के लिए प्रेरित किए जाने का आधार भी स्थापित करना जरूरी है। पीठ ने यह भी कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत द्विविवाह के अपराध के आवश्यक तत्व भी पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं होते हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले से महिला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर विराम लग गया है।
वैवाहिक विवाद से जुड़ा था मामला
पूरा मामला बिलासपुर निवासी महिला और रायपुर निवासी उसके पति के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। महिला का पहले विवाह हो चुका था और इसी वैवाहिक स्थिति को लेकर विवाद के बीच उसने दूसरी शादी की थी। बाद में बिलासपुर फैमिली कोर्ट ने 28 जनवरी 2023 को उसके पहले विवाह को तलाक की डिक्री के जरिए समाप्त कर दिया था। महिला का पक्ष था कि उसके दूसरे पति और ससुराल पक्ष को उसके पहले विवाह तथा उससे संबंधित तलाक की कार्यवाही की जानकारी थी। वैवाहिक जीवन में मतभेद बढ़ने के बाद महिला ने महिला थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उसने अपने ससुर के खिलाफ भी शिकायत की थी।
पति ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया था आवेदन
इसके बाद महिला के पति ने रायपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत आवेदन प्रस्तुत किया। आवेदन पर सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट ने 24 जुलाई 2024 को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 और 494 के तहत मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। मजिस्ट्रेट के आदेश के आधार पर न्यू राजेंद्र नगर थाने में अपराध दर्ज किया गया। पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद महिला के खिलाफ चार्जशीट भी पेश कर दी। इसके बाद महिला ने आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख किया।
महिला ने लगाया बदले की भावना से केस कराने का आरोप
हाईकोर्ट में दायर याचिका में महिला ने कहा कि उसका पति उसके पहले विवाह और तलाक की कार्यवाही के संबंध में पूरी जानकारी रखता था। ऐसे में उसके द्वारा किसी तथ्य को छिपाकर धोखा देने या बेईमानी से शादी के लिए प्रेरित करने का सवाल नहीं उठता। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि वैवाहिक संबंधों में विवाद बढ़ने और उसके द्वारा ससुराल पक्ष के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के बाद बदले की भावना से उसके खिलाफ आपराधिक मामला शुरू कराया गया। वहीं, राज्य और पति की ओर से याचिका का विरोध किया गया। उनका तर्क था कि मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रथम दृष्टया अपराध के पर्याप्त आधार मौजूद थे और महिला को अपना पक्ष ट्रायल कोर्ट में रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
धोखाधड़ी के लिए छल और बेईमानी जरूरी
हाईकोर्ट ने अभियोजन रिकॉर्ड और उपलब्ध सामग्री की समीक्षा करने के बाद महिला के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। धोखाधड़ी के आरोप पर पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले ह्रदयरंजन प्रसाद वर्मा बनाम स्टेट ऑफ बिहार का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि केवल किसी गलत जानकारी या तथ्य को छिपा लेना ही धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके साथ छल और बेईमानी का तत्व होना चाहिए तथा यह भी स्थापित होना चाहिए कि आरोपी के कृत्य के कारण संबंधित व्यक्ति ने अपनी संपत्ति या धन किसी को दिया अथवा किसी कार्य के लिए प्रेरित हुआ।
संपत्ति या रकम देने का सबूत नहीं मिला
हाईकोर्ट ने पाया कि जांच के दौरान ऐसा कोई ठोस आधार सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि पति ने महिला के कथित धोखे के कारण अपनी कोई संपत्ति या रकम उसके हवाले की थी। इसलिए धारा 420 आईपीसी के तहत धोखाधड़ी का आरोप प्रथम दृष्टया टिकाऊ नहीं पाया गया। इसी तरह, अदालत ने धारा 494 आईपीसी के तहत द्विविवाह के अपराध के लिए आवश्यक बुनियादी तत्व भी संतोषजनक रूप से स्थापित नहीं पाए। इन परिस्थितियों में डिवीजन बेंच ने महिला के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले और उससे जुड़ी आगे की कार्यवाही को खारिज कर दिया।