बिलासपुर हाईकोर्ट में दिव्यांगजन आरक्षण पर विवाद, आरक्षण न देने पर राज्य सरकार को भेजा नोटिस

छग

Update: 2025-09-20 17:36 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के बजाय राज्य सरकार द्वारा पुराने नियमों के तहत दिव्यांगजनों को आरक्षण देने के निर्णय को बिलासपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिका डॉ. रितेश तिवारी ने दायर की है। डॉ. तिवारी दोनों पैरों से दिव्यांग हैं, आयुर्वेद स्नातक हैं और बीएल कैटेगरी में सरकारी नौकरी के लिए पात्र हैं। याचिका में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ में वर्ष 1995 के अधिनियम के तहत केवल तीन कैटेगरी और पांच प्रकार की दिव्यांगता वाले व्यक्तियों को ही सरकारी सेवाओं में आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच के समक्ष पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा कि वर्ष 2016 में संसद द्वारा पारित दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम में कई बड़े बदलाव किए गए हैं। इस अधिनियम के तहत कुल 17 कैटेगरी की दिव्यांगताओं को आरक्षण का अधिकार दिया गया है। इनमें बहु विकलांगता, ऑटिज्म, मानसिक विकलांगता, एसिड अटैक विकलांगता, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, दृष्टिहीनता, बौनापन और अन्य शामिल हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि छत्तीसगढ़ सरकार केवल पुराने अधिनियम के अनुसार पांच प्रकार की दिव्यांगता वाले लोगों को ही आरक्षण का लाभ दे रही है। यह कदम संसद द्वारा पारित कानून का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य में दिव्यांगजनों के लिए कोई विशेष कमेटी का गठन नहीं किया गया, पद चिन्हांकित नहीं किए गए और आयु सीमा में छूट भी नहीं दी जा रही है।
अधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि दिव्यांगजनों के संवैधानिक अधिकारों और उनके आरक्षण के हक़ को सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी बताया कि 2016 के अधिनियम में दिव्यांगजनों की भौतिक, मानसिक और सामाजिक विकास की दृष्टि से व्यापक प्रावधान किए गए हैं, जिन्हें लागू करना आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला दिव्यांगजनों के संवैधानिक अधिकारों, रोजगार में आरक्षण और समान अवसर से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है। यदि राज्य सरकार पुराने नियमों को जारी रखती है, तो इससे दिव्यांगजनों के अधिकारों का हनन होगा।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट करे और बताए कि किस आधार पर पुराने अधिनियम के अनुसार आरक्षण दिया जा रहा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नए कानून के अनुसार राज्य में लागू न होने पर कारण बताने की आवश्यकता है। इस मामले में उच्च न्यायालय के आदेश से राज्य प्रशासन और संबंधित विभागों को दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण नियमों का पालन करने के लिए सक्रिय होना पड़ेगा। यदि 2016 के अधिनियम के अनुसार आरक्षण लागू नहीं किया गया, तो
याचिकाकर्ता
और अन्य दिव्यांगजन अधिकारों के लिए कोर्ट का सहारा ले सकते हैं। उल्लेखनीय है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी 17 प्रकार की दिव्यांगताओं वाले व्यक्तियों को सरकारी नौकरी और सामाजिक सुविधाओं में उचित आरक्षण मिले। अधिनियम में यह भी स्पष्ट किया गया है कि दिव्यांगजनों की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और समाजिक समावेशन के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं।
Tags:    

Similar News