राजनांदगांव। जनता से रिश्ता के पाठक रोशन साहू 'मोखला'(राजनांदगांव) ने एक कविता ई मेल किया है।

बस सुरता मा तँय बसे रे, मोर गाँव के नँगरिहा।

तहूँ परागे काबर कइसे, सुख- दुख के सपरिहा।।

ट्रेक्टर हार्वेस्टर रैपर आगे, भुलागे बइला-नाँगर।

नाँगर मूँठा हाथ मा राहय,होवय कभू न आँकर।।

होगे हे सुखियार मनखे, चलय- चलाय न जाँगर।

गाड़ा बइला संग नंदागे,दिखय न कोप्पर खासर।।

भाँय-भाँय गइया कोठा, अँगना सुन्ना बिन बछरू।

गोबरधन खुंदायेस कइसे, चँउक पीढ़ा ना पठरू।।

माढ़े सोहई तुलसी चौंरा, काकर बर राँधे खिचरी।

नइ सुनावय खरपड़ी घंटी, बाजय रे मन भितरी।।

बिहने-बिहने तरिया-नदिया, गोधन धो नउँहावस।

पूछी ला सुग्घर सुघरावस,सींग ला घलो रँगावस।।

गउधन के बिना रे बईहा, मनायेस कइसे देवारी।

देखत हावँय देव-पितर,तोला काय होगे संगवारी।।

घर के मनखे कस जनाये,आनी- बानी नाँव धरँय।

पसिया पानी संझा बिहने,दीया आरती पाँव परँय।।

होवय घरो-घर दूध-दही, बाँट- बाँट मिल खावँय।

दूधे नहाव दूधे अँचोवव,पुरखन असीस बरसावँय।

Tags: