फर्जी NGO में 1000 करोड़ की हेराफेरी, IAS अफसरों की संलिप्तता, देखें हाईकोर्ट का आदेश

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Update: 2025-09-24 15:13 GMT
Raipur. रायपुर। छत्तीसगढ़ में फर्जी NGO और SRC-PRRC घोटाले का मामला लगातार गहराता जा रहा है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने अब इस मामले की गंभीरता को देखते हुए CBI जांच के आदेश दिए हैं। आरोप है कि IAS अफसरों और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों ने दिव्यांगों की मदद और पुनर्वास के नाम पर बनी संस्थाओं का दुरुपयोग करते हुए करोड़ों नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपए तक की हेराफेरी की है। मामले की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें राज्य के तेजतर्रार माने जाने वाले वरिष्ठ IAS अफसरों—रिटायर्ड आईएएस विवेक ढांढ और एमके राउत—का नाम सीधे तौर पर सामने आया है। आरोप है कि इन अफसरों ने कांग्रेस शासन से पहले ही फर्जी NGO की नींव रखी और बाद में इसका इस्तेमाल संविदा नियुक्ति और फर्जी कर्मचारियों के नाम पर वेतन आहरण कर सरकारी खजाने को लूटने में किया।



SRC और PRRC की पृष्ठभूमि
इस पूरे विवाद की जड़ें SRC (स्टेट रिसोर्स सेंटर) और PRRC (फिजिकल रिफरल रिहैबिलिटेशन सेंटर) से जुड़ी हुई हैं।
SRC की स्थापना 2004 में दिव्यांगों के पुनर्वास कार्यों को तकनीकी सहयोग देने के लिए हुई थी।
वर्ष 2012 में PRRC की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य दिव्यांगों को कृत्रिम अंग, उपकरण और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध कराना था। कागजों पर योजना बेहद संवेदनशील और महत्वाकांक्षी दिखती थी। SRC से PRRC को कर्मचारियों के वेतन, उपकरणों की खरीद और अन्य गतिविधियों के लिए फंड मुहैया कराया जाता था। लेकिन याचिकाकर्ता का दावा है कि PRRC वास्तव में कभी संचालित नहीं हुआ, यह केवल कागजों पर चलता रहा।
करोड़ों की हेराफेरी के आरोप
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में बताया कि सरकार के जवाब के साथ दाखिल दस्तावेजों से साफ है कि करोड़ों रुपए पीआरआरसी नामक संस्था को जारी किए गए, जबकि उसका विधिवत अस्तित्व ही नहीं था।
इन पैसों की निकासी स्वयं चेक के जरिए की गई।
कई लोगों को बिना भर्ती प्रक्रिया के ही कर्मचारी दिखाकर उनके नाम पर वेतन निकाला गया।
कई भुगतानों को नकद दिखाया गया, जिससे लेन-देन की पारदर्शिता पूरी तरह संदिग्ध हो जाती है।

सरकारी विभाग पर NGO का कब्जा?
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि SRC एक सोसायटी है, जबकि PRRC समाज कल्याण विभाग की सरकारी इकाई है। ऐसे में यह कैसे संभव है कि एक NGO जैसी सोसायटी सरकारी विभाग का संचालन और वित्तीय प्रबंधन करे? यह सवाल न केवल वित्तीय अनियमितताओं बल्कि संस्थागत धोखाधड़ी और अधिकारियों की मिलीभगत की ओर भी इशारा करता है।

कृत्रिम अंग निर्माण पर सवाल
राज्य सरकार ने दावा किया कि PRRC में
प्रतिदिन 22–25 कृत्रिम अंग बनाए जाते हैं।
वर्ष 2012 से अब तक 4314 लाभार्थियों को उपकरण और उपचार दिए गए।
लेकिन याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि:
न तो मशीनों की खरीदी का रिकॉर्ड है।
न उत्पादन स्थल की जानकारी है।
न ही लाभार्थियों की सूची या केंद्र के संचालन का कोई प्रमाण है।
यानी, यह दावा भी महज कागजों का खेल लगता है।

छत्तीसगढ़ में दिव्यांगों के पुनर्वास और सहायतार्थ बनाए गए स्टेट रिसोर्स सेंटर (SRC) और फिजिकल रिफरल रिहैबिलिटेशन सेंटर (PRRC) में कथित करोड़ों रुपए के घोटाले को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर एक बार फिर हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। इस मामले में आरोप है कि दिव्यांगों को लाभ पहुंचाने के नाम पर वर्षों तक फर्जी कर्मचारियों की नियुक्तियां दिखाकर वेतन निकाला गया और करोड़ों की सरकारी राशि को हड़प लिया गया। इस मामले की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई, जब एक याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल की। इसमें मांग की गई कि CBI या किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से मामले की जांच कराई जाए, ताकि बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हो सके। शुरुआत में यह याचिका आपराधिक रिट के तौर पर दाखिल की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इसे जनहित याचिका (PIL) मानते हुए डिवीजन बेंच को सौंप दिया।

करोड़ों की हेराफेरी का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सरकार के जवाब में संलग्न अनुक्रमणिका-आर-1 से स्पष्ट है कि करोड़ों रुपए पीआरआरसी नामक संस्था को जारी किए गए, जबकि उसका कोई विधिवत अस्तित्व ही नहीं है। इन पैसों की निकासी स्वयं चेक के जरिए की गई, जो सरकारी धन की बड़ी हेराफेरी का मामला है।

सरकारी विभाग पर NGO का कब्जा?
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एसआरसी (स्टेट रिसोर्स सेंटर) एक पंजीकृत सोसायटी है, जबकि पीआरआरसी समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत सरकारी इकाई है। ऐसे में यह गंभीर प्रश्न है कि एक सोसायटी किस प्रकार से सरकारी विभाग का संचालन और वित्तीय प्रबंधन कर सकती है। यह प्रशासनिक अनियमितता और मिलीभगत का संकेत है।

कृत्रिम अंग निर्माण पर भी उठे सवाल
राज्य सरकार की ओर से यह दावा किया गया कि पीआरआरसी में प्रतिदिन 22 से 25 कृत्रिम अंग बनाए जाते हैं और 2012 से अब तक 4314 लाभार्थियों को मुफ्त उपचार व उपकरण दिए गए। परंतु, इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया। न तो मशीनों की खरीदी का रिकार्ड, न उत्पादन स्थल की जानकारी और न ही उपचार केंद्र का प्रमाण।

बिलासपुर में भी भुगतान का खुलासा
सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा कि पूरे राज्य में केवल एक पीआरआरसी है, लेकिन अनुक्रमणिका-पी-8 में बिलासपुर स्थित पीआरआरसी कर्मचारियों को वेतन भुगतान का उल्लेख है। यह विरोधाभास स्वयं सरकारी दावों की सच्चाई पर सवाल खड़े करता है।

जांच रिपोर्ट और हलफनामे पर चुप्पी
मामले में वित्त सचिव की रिपोर्ट और मुख्य सचिव का हलफनामा भी रिकॉर्ड पर मौजूद है, जिसमें गड़बड़ियों को स्पष्ट रूप से स्वीकारा गया है। इसके बावजूद अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई नहीं की गई। उल्टा, सरकार की ओर से मामले को दबाने का प्रयास किया गया। 

2019 की विवादित बैठक और SRC का विघटन
याचिकाकर्ता ने बताया कि 9 सितंबर 2019 को स्टेट रिसोर्स सेंटर की प्रबंध समिति की बैठक हुई। इसमें SRC को भंग करने, उसके सभी बैंक खाते बंद करने और सभी अचल संपत्तियों को रायपुर स्थित स्टेट रिसोर्स एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर के नाम ट्रांसफर करने का निर्णय लिया गया। साथ ही, संबंधित अधिकारियों के खिलाफ लंबित कार्यवाही को बंद करने का भी प्रस्ताव पारित किया गया। क्रमांक-26 भी शामिल था, जिसे पहले वित्तीय अनियमितताओं का दोषी पाया गया था। समाज कल्याण निदेशालय ने 9 जुलाई 2018 को आदेश जारी कर उससे सभी वित्तीय अधिकार वापस ले लिए थे और SRC से जुड़े कार्य न सौंपने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद उसका हस्ताक्षर बैठक में स्वीकार किया गया, जो प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

घोटाले की बू और जिम्मेदारों की मिलीभगत
याचिकाकर्ता की ओर से साफ कहा गया कि इन समस्त परिस्थितियों से स्पष्ट है कि पीआरआरसी और SRC के नाम पर सरकारी धन की बड़े पैमाने पर घोटाला और दुरुपयोग हुआ है। सरकारी दस्तावेजों और कोर्ट के समक्ष पेश रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि होने के बाद भी अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई न होना राज्य प्रशासन की भूमिका को संदिग्ध बनाता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह मामला केवल वित्तीय गड़बड़ी नहीं बल्कि संस्थागत धोखाधड़ी है, जिसमें सरकारी विभागों और सोसायटी के पदाधिकारियों की सांठगांठ उजागर होती है। अब देखना होगा कि न्यायालय इस पर क्या रुख अपनाता है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई होती है।

घोटाले के आरोप
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि PRRC केवल कागजों पर संचालित होता रहा। वहां न तो कोई भर्ती प्रक्रिया अपनाई गई और न ही दिव्यांगों के लिए वास्तविक अस्पताल या केंद्र संचालित हुए। बावजूद इसके, फर्जी कर्मचारियों की सूची बनाकर SRC के बैंक खातों (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, रायपुर) से बड़े पैमाने पर वेतन निकाला गया। यहां तक कि कई भुगतान नकद दिखाए गए। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसे और कई अन्य लोगों को बिना किसी आवेदन या नियुक्ति प्रक्रिया के PRRC का कर्मचारी दिखाया गया और उनके नाम पर लाखों का वेतन निकाला गया। जबकि उन्होंने कभी उस संस्थान में काम नहीं किया। जब इस बारे में उन्होंने जानकारी हासिल करने के लिए RTI आवेदन लगाया, तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई।

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही
इस मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 30 जनवरी 2020 को आदेश जारी करते हुए CBI को FIR दर्ज करने, सभी रिकॉर्ड जब्त करने और निष्पक्ष जांच करने का निर्देश दिया था। इसके बाद संबंधित विभागों और अधिकारियों ने इस आदेश की समीक्षा याचिकाएं दाखिल कीं, जिन्हें 6 फरवरी 2020 को खारिज कर दिया गया। हालांकि, इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की गई। सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2021 को हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा
हाईकोर्ट
में पुनर्विचार के लिए भेज दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला गंभीर है और इसमें कई उच्च पदस्थ अधिकारियों पर आरोप हैं, लेकिन हाईकोर्ट ने सभी 31 प्रतिवादियों को विधिवत नोटिस जारी किए बिना ही अंतिम आदेश पारित कर दिया था। इसलिए, उचित होगा कि इसे फिर से merit पर सुना जाए। अब यह मामला हाईकोर्ट के समक्ष मूल याचिका संख्या के साथ बहाल हो गया है। कोर्ट इस पर सभी पक्षों को सुनकर नए सिरे से फैसला करेगा। मामले में गंभीर आपराधिक आरोप हैं, जिनमें सरकारी धन की हेराफेरी, फर्जी नियुक्तियां और दिव्यांगों की योजनाओं के नाम पर जनता के पैसे की बंदरबांट शामिल है।
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