पटना। बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज करने वाले बंशीधर बृजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित राहुल राज के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की घोषणा के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। दोनों नेताओं के फैसले को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और जन सुराज ने कड़ी आपत्ति जताई है। विपक्षी दलों ने इस कदम को मतदाताओं के जनादेश के खिलाफ बताते हुए कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, शनिवार को दोनों निर्दलीय विधान परिषद सदस्यों ने भाजपा में शामिल होने की घोषणा की। इसके बाद बिहार की राजनीति में निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में निर्वाचित प्रतिनिधियों के किसी राजनीतिक दल में शामिल होने के संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर चर्चा शुरू हो गई है।
बंशीधर बृजवासी तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद पहुंचे हैं, जबकि राहुल राज सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों की पहचान निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने वाले नेताओं की रही है। ऐसे में उनके भाजपा में शामिल होने की घोषणा पर विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं।
शनिवार को पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में दोनों नेताओं की मौजूदगी के बाद पार्टी की सदस्यता लेने की खबर सामने आई। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे। दोनों निर्दलीय विधान पार्षद भाजपा विधानमंडल दल की बैठक में भी शामिल हुए। इसके बाद उनकी तस्वीरें और पार्टी में शामिल होने से संबंधित दावे सामने आए।
हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद मामले में नया मोड़ आ गया। बंशीधर बृजवासी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने भाजपा की औपचारिक सदस्यता नहीं ली है, बल्कि सरकार को समर्थन देने की बात कही है। भाजपा की ओर से भी बाद में दोनों नेताओं के औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल नहीं होने और केवल समर्थन देने का दावा किया गया। इस सफाई के बाद विवाद का मुख्य मुद्दा यह बन गया कि दोनों नेताओं ने वास्तव में राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण की थी या केवल समर्थन देने की घोषणा की थी।
राष्ट्रीय जनता दल ने इस पूरे घटनाक्रम पर आपत्ति जताई है। राजद नेताओं का आरोप है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेना संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों का उल्लंघन है। पार्टी ने दोनों विधान पार्षदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग की है।
राजद नेता मनोज कुमार झा ने इस मामले में विधान परिषद के सभापति के समक्ष शिकायत करने की बात कही है। उन्होंने भाजपा पर जनादेश के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया। वहीं, राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी दोनों निर्वाचित सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है। ये विपक्षी नेताओं के आरोप और मांगें हैं, जिन पर अभी किसी सक्षम प्राधिकारी का अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी इस मामले में कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। पार्टी का कहना है कि निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का आधार बन सकता है। जन सुराज ने विधान परिषद के सभापति के समक्ष याचिका दाखिल करने और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय जाने की बात कही है।
दरअसल, भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित होता है और चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो वह सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है।
हालांकि, किसी निर्दलीय निर्वाचित प्रतिनिधि का सरकार या किसी दल को समर्थन देना और उस दल की औपचारिक सदस्यता ग्रहण करना अलग-अलग परिस्थितियां हैं। केवल राजनीतिक समर्थन देने से स्वतः अयोग्यता नहीं होती। इसलिए इस मामले में सदस्यता से जुड़े दस्तावेज, सार्वजनिक घोषणाएं और अन्य उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।
बंशीधर बृजवासी तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार दूसरी बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए हैं। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2024 में हुए उपचुनाव में भी जीत दर्ज की थी। वहीं, राहुल राज पहली बार सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद पहुंचे हैं। दोनों नेताओं ने हालिया चुनाव में जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशियों को हराया था।
राहुल राज का भाजपा से पुराना राजनीतिक संबंध रहा है। सारण शिक्षक सीट गठबंधन के अंतर्गत जदयू के हिस्से में जाने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था। इस कारण भाजपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था। चुनाव जीतने के बाद उनके भाजपा कार्यालय पहुंचने और सदस्यता लेने की घोषणा से विवाद और बढ़ गया।
इस घटनाक्रम पर जदयू के कुछ नेताओं की नाराजगी भी सामने आई है। चूंकि दोनों निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनाव में जदयू प्रत्याशियों को हराया था, इसलिए उनके भाजपा के साथ आने को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी सवाल उठे। हालांकि, दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की ओर से इस मुद्दे पर किसी औपचारिक गठबंधन संबंधी फैसले की पुष्टि नहीं हुई है।
बिहार विधान परिषद में कुल 75 सीटें हैं। दो निर्दलीय सदस्यों के भाजपा के साथ आने से परिषद के भीतर राजनीतिक समर्थन का समीकरण प्रभावित हो सकता है। लेकिन दोनों की औपचारिक दलगत स्थिति को लेकर विवाद के कारण उन्हें भाजपा के निर्वाचित सदस्यों के रूप में गिनना फिलहाल उचित नहीं होगा।
राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें चुनावी जनादेश और संवैधानिक नियमों की व्याख्या दोनों जुड़े हुए हैं। विपक्ष का तर्क है कि मतदाताओं ने दोनों नेताओं को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुना था। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से समर्थन और औपचारिक सदस्यता के बीच अंतर का हवाला दिया जा रहा है।
अब पूरे विवाद में विधान परिषद के सभापति की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि दोनों नेताओं के खिलाफ अयोग्यता की याचिका दाखिल होती है, तो संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले पर विचार किया जाएगा। किसी भी संभावित निर्णय को न्यायिक चुनौती दिए जाने की संभावना भी बनी रह सकती है।
फिलहाल बिहार में दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भाजपा के साथ आने का मामला राजनीतिक विवाद का विषय बना हुआ है। राजद और जन सुराज की कानूनी कार्रवाई की चेतावनी तथा बंशीधर बृजवासी की सफाई के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि औपचारिक सदस्यता को लेकर क्या तथ्य स्थापित होते हैं और सक्षम प्राधिकारी क्या निर्णय लेते हैं।