पटना: आधुनिक बैंकिंग की शुरुआत वर्ष 1862 में बैंक ऑफ बंगाल की पहली शाखा से हुई थी। यह कदम केवल बिहार ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वी भारत की वित्तीय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण शुरुआत माना जाता है। इससे पहले 1860 में बैंक ऑफ बंगाल ने विभिन्न शहरों में शाखाएं खोलने का निर्णय लिया था, जिसमें पटना भी शामिल था। उस समय ढाका को छोड़कर इन शहरों में आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था नहीं थी।
शुरुआती दौर में पटना शाखा का कारोबार मुख्य रूप से इंडिगो प्लांटर्स, व्यापारियों और रेलवे अधिकारियों के सहयोग से आगे बढ़ा। यहां बिल डिस्काउंटिंग बैंकिंग का प्रमुख आधार था। उस समय बैंक में खाता खोलना आसान नहीं था और इसे सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इंपीरियल बैंक में खाता होना सम्मान की पहचान समझा जाता था। वर्ष 1921 में बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास के विलय से इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का गठन हुआ। बाद में 1 जुलाई 1955 को इसका नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) कर दिया गया।
पटना में बैंकिंग व्यवस्था समय के साथ मजबूत होती गई। 1934 के भूकंप के बाद बैंक भवन का पुनर्निर्माण किया गया और इसे आधुनिक स्वरूप दिया गया। बैंक के पास विशाल परिसर और मजबूत ढांचा विकसित हुआ, जिसने पटना को एक प्रमुख बैंकिंग केंद्र के रूप में स्थापित किया। स्वतंत्रता के बाद 1969 में बैंक ऑफ बिहार की 48 शाखाओं का SBI में विलय किया गया, जिससे राज्य की बैंकिंग व्यवस्था और अधिक मजबूत हुई। बैंक ऑफ बिहार की स्थापना 1911 में हुई थी और यह बिहार के प्रमुख बैंकों में शामिल था।
पटना सिटी में इंपीरियल बैंक का ‘पे ऑफिस’ भी संचालित होता था, जहां केवल नकद लेन-देन होते थे। व्यापारियों के गोदाम बैंक के नियंत्रण में रहते थे और बड़े भुगतान हुंडी एवं रुक्का के माध्यम से किए जाते थे। आज पटना की यह 163 वर्षों की बैंकिंग यात्रा आधुनिक भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की मजबूत नींव को दर्शाती है, जो बैंक ऑफ बंगाल से शुरू होकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तक पहुंची है।