चंडीगढ़। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं। फेफड़ों की क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और श्वसन मांसपेशियों की ताकत में कमी के कारण वरिष्ठ नागरिकों में सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। चेस्ट डिजिज अस्पताल के एचओडी डॉ. राहुल गुप्ता ने यह जानकारी वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर आयोजित स्वास्थ्य वार्ता में दी।

सेंट्रल गवर्नमेंट पेंशनर्स वेलफेयर की ओर से बुजुर्गों में सामान्य छाती संबंधी रोग विषय पर स्वास्थ्य वार्ता का आयोजन किया गया। इसमें डॉ. राहुल गुप्ता ने वरिष्ठ नागरिकों में होने वाली विभिन्न श्वसन संबंधी बीमारियों, उनके जोखिम और बचाव के उपायों पर विस्तार से जानकारी दी।

उम्र के साथ कमजोर होती है श्वसन क्षमता

डॉ. राहुल गुप्ता ने बताया कि बढ़ती उम्र के साथ फेफड़ों की कार्यक्षमता स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है। श्वसन मांसपेशियों की ताकत कम होने के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी कमी आती है। इसका सीधा असर बुजुर्गों की सांस संबंधी स्वास्थ्य स्थिति पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को सांस लेने में तकलीफ, लगातार खांसी, बलगम, सीने में जकड़न या बार-बार होने वाले श्वसन संक्रमण को सामान्य उम्र संबंधी समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण लंबे समय तक बने रहने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

सीओपीडी प्रमुख गंभीर बीमारी

डॉ. राहुल के अनुसार, क्रानिक आब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) बुजुर्गों में होने वाली गंभीर सांस संबंधी बीमारियों में प्रमुख है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी दुनिया में मृत्यु के तीसरे प्रमुख कारणों में शामिल है।

उनके अनुसार, भारत में हर वर्ष सीओपीडी के कारण करीब पांच लाख लोगों की मृत्यु होती है, जबकि दुनियाभर में यह आंकड़ा लगभग 30 लाख है। सीओपीडी में सांस की नलियों और फेफड़ों को नुकसान पहुंचने के कारण व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी होती है।

बीमारी बढ़ने पर सामान्य दैनिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए इसके शुरुआती लक्षणों को पहचानना और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद जरूरी है।

बुजुर्गों में कई अन्य बीमारियों का खतरा

स्वास्थ्य वार्ता में डॉ. राहुल गुप्ता ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों में केवल सीओपीडी ही नहीं, बल्कि कई अन्य छाती संबंधी बीमारियां भी देखी जाती हैं। इनमें अस्थमा, निमोनिया, इंटरस्टिशियल लंग डिजीज, एस्पिरेशन निमोनिया, तपेदिक (टीबी), ब्रोंकिइक्टेसिस और फेफड़ों का कैंसर प्रमुख हैं।

उन्होंने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ संक्रमण से लड़ने की क्षमता कम हो सकती है। इस कारण बुजुर्गों में निमोनिया जैसी बीमारियां गंभीर रूप ले सकती हैं। खासकर पहले से किसी श्वसन रोग से पीड़ित वरिष्ठ नागरिकों को संक्रमण से बचाव के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है।

टीबी को लेकर जताई चिंता

डॉ. राहुल गुप्ता ने कहा कि भारत अभी भी टीबी से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि 2026 तक टीबी उन्मूलन का निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं हो सका है।

उन्होंने कहा कि टीबी को लेकर जागरूकता बढ़ाना और इसके लक्षणों की समय पर पहचान करना जरूरी है। लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, रात में पसीना आना या कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

टीबी के मामले में समय पर जांच और पूरा उपचार बीमारी को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा परिवार के अन्य सदस्यों और आसपास के लोगों में संक्रमण फैलने के जोखिम को कम करने के लिए भी समय पर चिकित्सकीय कदम उठाना जरूरी है।

धूम्रपान से दूरी जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार, फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए धूम्रपान और तंबाकू के सेवन से दूरी बनाना बेहद महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक धूम्रपान करना सीओपीडी और फेफड़ों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का प्रमुख जोखिम कारक है।

बुजुर्गों के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों को भी धूम्रपान के धुएं से बचाना जरूरी है। प्रदूषण और धूल के संपर्क को कम करना तथा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार नियमित स्वास्थ्य जांच कराना भी श्वसन स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है।

जागरूकता से कम हो सकता है जोखिम

स्वास्थ्य वार्ता में इस बात पर जोर दिया गया कि वरिष्ठ नागरिकों को अपनी सांस संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूक रहना चाहिए। किसी भी बीमारी का शुरुआती चरण में पता लगने पर उसके प्रबंधन की संभावना बेहतर होती है।

डॉ. राहुल गुप्ता ने बुजुर्गों को नियमित स्वास्थ्य जांच कराने, चिकित्सकीय सलाह का पालन करने और सांस संबंधी लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की सलाह दी। परिवार के सदस्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बुजुर्ग कई बार अपनी परेशानी को सामान्य मानकर उपचार में देरी कर देते हैं।

वरिष्ठ नागरिक दिवस पर आयोजित इस स्वास्थ्य वार्ता का उद्देश्य बुजुर्गों को आम छाती संबंधी बीमारियों के प्रति जागरूक करना और समय पर जांच व उपचार के महत्व को समझाना था। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि बढ़ती उम्र में फेफड़ों की क्षमता और प्रतिरोधक क्षमता में कमी के कारण सावधानी, जागरूकता और समय पर चिकित्सकीय देखभाल बेहद जरूरी है।

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