बिहार का नाम आते ही लिट्टी-चोखा के साथ एक और पारंपरिक व्यंजन की चर्चा जरूर होती है और वह है ठेकुआ। गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी और घी से तैयार होने वाला ठेकुआ सिर्फ स्वादिष्ट पकवान नहीं, बल्कि लोक आस्था से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। खासकर छठ महापर्व में इसे प्रसाद के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसका नाम ‘ठेकुआ’ आखिर पड़ा कैसे?
कैसे पड़ा ठेकुआ नाम?
ठेकुआ के नाम की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग लोकमान्यताएं प्रचलित हैं और इसका कोई एक सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार इसे बनाने के पारंपरिक तरीके से इसका नाम जुड़ा है। तैयार आटे को हाथ से दबाकर या लकड़ी के विशेष सांचे पर ठोककर-दबाकर आकार दिया जाता है। इसी प्रक्रिया से ‘ठेकुआ’ या उससे मिलते-जुलते स्थानीय नाम के प्रचलित होने की बात कही जाती है।
बिहार और आसपास के क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। कहीं इसे ठेकुआ तो कहीं खजूरिया या टिकरी जैसे स्थानीय नामों से पुकारा जाता है। बनाने के तरीके और सामग्री में भी क्षेत्र के अनुसार थोड़ा अंतर देखने को मिलता है।
छठ पूजा में है विशेष महत्व
ठेकुआ का सबसे गहरा संबंध छठ महापर्व से है। छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया को चढ़ाए जाने वाले प्रमुख प्रसाद में ठेकुआ शामिल होता है। व्रती इसे बेहद शुद्धता और पारंपरिक विधि से तैयार करते हैं। प्रसाद बनाने के दौरान साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पारंपरिक तौर पर ठेकुआ बनाने के लिए गेहूं के आटे में गुड़ का घोल मिलाया जाता है। इसमें घी और नारियल जैसी सामग्री भी डाली जा सकती है। इसके बाद आटे को गूंथकर छोटे हिस्सों में बांटा जाता है और हाथ या लकड़ी के सांचे की मदद से सुंदर डिजाइन दिया जाता है। फिर इसे घी या तेल में धीमी आंच पर तला जाता है।
लंबे समय तक खराब नहीं होना इसकी खासियत
ठेकुआ की एक बड़ी खासियत यह है कि इसे सही तरीके से तैयार और सुरक्षित रखने पर कई दिनों तक खाया जा सकता है। इसमें पानी और नमी अपेक्षाकृत कम होने के कारण यह यात्रा के लिए भी सुविधाजनक पारंपरिक खाद्य पदार्थ रहा है। पुराने समय में लंबी यात्राओं पर लोग ऐसे सूखे पकवान अपने साथ ले जाते थे।
बिहार से बाहर भी लोकप्रिय
आज ठेकुआ केवल बिहार तक सीमित नहीं है। झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी इससे मिलते-जुलते पकवान और परंपराएं देखने को मिलती हैं। बिहार और झारखंड के लोग देश-दुनिया के जिन हिस्सों में बसे हैं, वहां छठ पूजा के साथ ठेकुआ बनाने की परंपरा भी पहुंची है।
समय के साथ ठेकुआ के नए रूप भी सामने आए हैं, लेकिन छठ पूजा में पारंपरिक ठेकुआ का महत्व कायम है। यह पकवान बिहार की खानपान परंपरा, लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसे आज राज्य की पहचान के तौर पर भी देखा जाता है।
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