नई दिल्ली। भारतीय लोक संस्कृति में जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक हर अवसर के लिए विशेष गीतों की परंपरा रही है। इन्हीं लोकगीतों में एक महत्वपूर्ण स्थान सोहर का है। बिहार, उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में बच्चे के जन्म के अवसर पर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले इन मंगल गीतों को सोहर कहा जाता है। हालांकि, लंबे समय तक यह परंपरा केवल बेटों के जन्म तक ही सीमित रही। बेटियों के जन्म पर सोहर गाने की परंपरा बहुत कम देखने को मिलती थी।
इस पुरानी सोच और परंपरा को बदलने का काम मशहूर लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने किया। उन्होंने बेटियों के जन्म की खुशी को व्यक्त करने के लिए एक खास सोहर लिखा और अपनी आवाज दी। उनका यह प्रयास आज लोक संगीत की दुनिया में एक नई मिसाल बन चुका है।
मालिनी अवस्थी ने बताया कि जब उनकी बेटी का जन्म हुआ, तब उन्हें महसूस हुआ कि बेटियों के जन्म पर गाए जाने वाले लोकगीत बहुत कम हैं। जबकि बेटियों का जन्म भी उतनी ही खुशी और उत्सव का अवसर है, जितना बेटों का जन्म। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने माता सीता के जन्म पर आधारित एक सोहर की रचना की।
इस सोहर के बोल हैं, "मिथिला मगन भई आज, सिया को जन्म भयो…"। इस गीत में माता सीता के जन्म के समय मिथिला में छाई खुशियों का सुंदर वर्णन किया गया है। गीत में राजा जनक और माता सुनैना की खुशी को दर्शाया गया है। बेटी सीता के जन्म से पूरा जनकपुर आनंद में डूब जाता है। राजा जनक खुशी में दान करते हैं और रानी सुनैना अपनी बेटी को गोद में लेकर प्यार और स्नेह बरसाती हैं।
मालिनी अवस्थी द्वारा गाया गया यह सोहर लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। इसकी भावनात्मक प्रस्तुति और मधुर धुन ने इसे खास पहचान दिलाई। आज यह गीत कई जगहों पर बेटियों के जन्म के अवसर पर भी गाया जाता है। इसने समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने का काम किया है।
लोक परंपरा में सोहर का विशेष महत्व रहा है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत भगवान श्रीराम और भगवान कृष्ण के जन्म से जुड़े मंगल गीतों से हुई। पुराने समय में गांवों में जब किसी घर में बच्चे का जन्म होता था, तो महिलाएं एकत्र होकर ढोलक की थाप पर सोहर गाती थीं। इन गीतों में नवजात शिशु के लिए आशीर्वाद, मां की भावनाएं और परिवार की खुशियों को शामिल किया जाता था।
परंपरागत सोहरों में अक्सर बेटे के जन्म का उल्लेख मिलता था। इनमें "ललनवा" और "बबुआ" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था। भगवान राम और कृष्ण के जन्म प्रसंगों को जोड़कर मां को कौशल्या और यशोदा के रूप में संबोधित किया जाता था। यही वजह थी कि बेटियों के जन्म को लेकर अलग लोकगीतों की कमी महसूस होती थी।
सोहर केवल जन्म की खुशी का गीत नहीं होता, बल्कि इसमें परिवार और समाज के रिश्तों की झलक भी दिखाई देती है। इनमें मां की ममता, नवजात के प्रति प्यार, सास-बहू के रिश्ते, ननद-भौजाई की नोकझोंक और पारिवारिक परंपराओं का भी वर्णन मिलता है। यही कारण है कि सोहर भारतीय लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
मालिनी अवस्थी की यह पहल केवल एक गीत लिखने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने लोक संगीत में एक नई सोच को जन्म दिया। उन्होंने दिखाया कि परंपराओं को सम्मान देते हुए उनमें सकारात्मक बदलाव भी लाया जा सकता है। बेटियों के जन्म को उत्सव के रूप में मनाने का संदेश देने वाला यह सोहर आज कई परिवारों के लिए खुशी और गर्व का प्रतीक बन गया है।
लोक संस्कृति और संगीत के क्षेत्र में यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा देने वाला है। यह बताता है कि कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने की ताकत भी रखती है।