नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई अभिनेत्रियां ऐसी हुईं, जिन्होंने पर्दे पर अपने अभिनय से पहचान बनाई। लेकिन स्नेहलता रेड्डी की कहानी फिल्मों से कहीं आगे जाती है। वह कन्नड़ और तेलुगु सिनेमा की अभिनेत्री, रंगमंच कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता थीं। देश में 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब आठ महीने जेल में रखा गया। जेल से गंभीर हालत में रिहा होने के महज पांच दिन बाद 20 जनवरी 1977 को उनकी मौत हो गई।
स्नेहलता रेड्डी का मामला दशकों बाद भी इसलिए चर्चा में आता है क्योंकि उनके जेल जीवन से जुड़े विवरण बेहद परेशान करने वाले हैं। उनकी जेल डायरी में महिला कैदियों को निर्वस्त्र किए जाने और अपमानजनक व्यवहार का जिक्र मिलता है। बाद की कई रिपोर्टों और राजनीतिक बयानों में दावा किया गया कि स्नेहलता को भी निर्वस्त्र कर पीटा गया और बेहद खराब परिस्थितियों में रखा गया।
कौन थीं स्नेहलता रेड्डी?
स्नेहलता रेड्डी का जन्म 1932 में हुआ था। उन्होंने कन्नड़ और तेलुगु सिनेमा के साथ थिएटर की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। वह केवल अभिनेत्री नहीं थीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों में भी सक्रिय रहती थीं।
उनकी चर्चित फिल्मों में ‘संस्कार’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 1970 की इस कन्नड़ फिल्म को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला और स्नेहलता के अभिनय को भी पहचान मिली। वह थिएटर गतिविधियों से भी गहराई से जुड़ी थीं।
उनके पति पट्टाभि राम रेड्डी कवि, फिल्म निर्माता और निर्देशक थे। स्नेहलता का परिवार समाजवादी विचारों से प्रभावित था और उस दौर के कई राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं से उनके संबंध थे।
जॉर्ज फर्नांडिस से दोस्ती बनी मुश्किल?
स्नेहलता रेड्डी की दोस्ती समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस से थी। आपातकाल के दौरान फर्नांडिस सरकार के प्रमुख विरोधियों में शामिल थे और भूमिगत हो गए थे।
इसी दौरान बड़ौदा डायनामाइट केस सामने आया। आरोप था कि सरकार के खिलाफ विरोध के दौरान डायनामाइट विस्फोट की योजना बनाई गई थी। जॉर्ज फर्नांडिस इस मामले के प्रमुख आरोपियों में शामिल किए गए।
2 मई 1976 को स्नेहलता रेड्डी को गिरफ्तार किया गया। उन्हें बड़ौदा डायनामाइट मामले से जोड़ा गया, लेकिन बाद में अंतिम चार्जशीट में उनका नाम शामिल नहीं था। इसके बावजूद उन्हें MISA यानी Maintenance of Internal Security Act के तहत महीनों तक जेल में रखा गया।
करीब आठ महीने जेल में रहीं
स्नेहलता को बेंगलुरु सेंट्रल जेल में रखा गया। उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अदालत में साबित होने से पहले ही उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रहना पड़ा।
अलग-अलग ऐतिहासिक विवरणों और उनकी डायरी में जेल की खराब परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। उनके पास सामान्य शौचालय और पर्याप्त सुविधाएं नहीं होने की बात भी सामने आती है। रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें बेहद अस्वच्छ परिस्थितियों में रहना पड़ा।
उनकी कहानी में सबसे ज्यादा चर्चा जेल में कथित यातनाओं की होती है।
निर्वस्त्र कर पिटाई किए जाने का दावा
स्नेहलता रेड्डी को लेकर वर्षों बाद सामने आए विवरणों में दावा किया गया कि जेल में उनके कपड़े उतरवाकर उन्हें पीटा गया। 2026 में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने भी इस मामले को उठाते हुए यही आरोप दोहराया। उन्होंने स्नेहलता की गिरफ्तारी और मौत को आपातकाल के दौरान हुई यातनाओं के उदाहरण के रूप में पेश किया।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण फर्क है। स्नेहलता की अपनी प्रकाशित जेल डायरी में महिला कैदियों को जेल में प्रवेश के समय निर्वस्त्र किए जाने की प्रथा पर उन्होंने तीखा सवाल उठाया था। बाद के विवरणों में उनके साथ भी निर्वस्त्र कर मारपीट किए जाने का दावा मिलता है। इसलिए इन घटनाओं को ऐतिहासिक दावों और विवरणों के रूप में प्रस्तुत करना अधिक सटीक है।
जेल से सुनाई देती थीं चीखें
स्नेहलता की जेल में हालत कितनी खराब थी, इसे लेकर उस दौर में जेल में बंद दूसरे राजनीतिक नेताओं के संस्मरण भी चर्चा में रहे हैं।
समाजवादी नेता मधु दंडवते ने अपने संस्मरण में स्नेहलता की कोठरी से रात में चीखें सुनाई देने का उल्लेख किया था। उसी जेल में आपातकाल के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता भी बंद रहे थे।
इन विवरणों ने बाद के वर्षों में स्नेहलता की कहानी को आपातकाल के सबसे चर्चित मानवाधिकार मामलों में शामिल कर दिया।
अस्थमा से पहले ही थीं परेशान
स्नेहलता रेड्डी को गंभीर अस्थमा की समस्या थी। जेल की परिस्थितियों में उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला गया।
रिपोर्टों के अनुसार जमीन पर सोना, अस्वच्छ वातावरण और स्वास्थ्य संबंधी पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलने से उनकी बीमारी और गंभीर होती गई। उनकी हालत इतनी बिगड़ी कि बाद के विवरणों में उनके दो बार कोमा जैसी स्थिति में जाने की बात भी कही गई है।
स्नेहलता अपनी खराब होती सेहत के बावजूद जेल में रहीं। उनके स्वास्थ्य को लेकर परिवार और समर्थकों की चिंता बढ़ती गई।
जेल में लिखी अपनी डायरी
स्नेहलता रेड्डी की कहानी को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत उनकी जेल डायरी है।
उन्होंने जेल में रहते हुए अपने अनुभव और महिला कैदियों की परिस्थितियों के बारे में लिखा। उनकी डायरी को बाद में 1977 में कर्नाटक मानवाधिकार समिति द्वारा ‘A Prison Diary’ के रूप में प्रकाशित किए जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में उनके अनुभवों पर डॉक्यूमेंट्री भी बनी।
डायरी में उन्होंने सवाल उठाया था कि किसी व्यक्ति को सजा देना अलग बात है, लेकिन उसके शरीर और मानवीय गरिमा को अपमानित करना क्यों जरूरी है।
उनकी ये बातें आज भी जेलों में मानवाधिकार और महिला कैदियों के सम्मान से जुड़ी चर्चाओं में उद्धृत की जाती हैं।
15 जनवरी को मिली रिहाई
करीब आठ महीने जेल में रहने के बाद स्नेहलता रेड्डी की तबीयत बेहद खराब हो चुकी थी।
15 जनवरी 1977 को उन्हें पैरोल पर रिहा किया गया। लेकिन तब तक उनका शरीर बीमारी और लंबे कारावास से बुरी तरह प्रभावित हो चुका था।
रिहाई के बाद परिवार को उम्मीद थी कि इलाज से उनकी स्थिति सुधरेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सिर्फ पांच दिन बाद मौत
जेल से बाहर आने के महज पांच दिन बाद, 20 जनवरी 1977 को स्नेहलता रेड्डी की मौत हो गई। रिपोर्टों में उनकी मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया है। वह लंबे समय से अस्थमा और खराब स्वास्थ्य से जूझ रही थीं।
यही पांच दिन उनकी कहानी को और मार्मिक बना देते हैं। करीब आठ महीने जेल में रहने के बाद उन्हें आजादी मिली, लेकिन वह उसका आनंद कुछ दिनों से ज्यादा नहीं ले सकीं।
उनकी मौत के बाद जेल में उनके साथ हुए व्यवहार और गिरफ्तारी को लेकर गंभीर सवाल उठे।
जिस केस में पकड़ी गईं उसी की चार्जशीट में नाम नहीं
स्नेहलता रेड्डी की गिरफ्तारी से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्हें बड़ौदा डायनामाइट केस से जोड़ा गया था, लेकिन अंतिम चार्जशीट में उनका नाम नहीं था। इसके बावजूद MISA के तहत उन्हें करीब आठ महीने तक हिरासत में रखा गया।
यही वजह है कि उनकी कहानी आपातकाल के दौरान बिना मुकदमे लंबे समय तक हिरासत और नागरिक स्वतंत्रता के सवालों के साथ जोड़ी जाती है।
अपनी आखिरी फिल्म भी नहीं देख सकीं
स्नेहलता रेड्डी की जिंदगी का एक दुखद पहलू सिनेमा से भी जुड़ा है।
आपातकाल से पहले ‘चंदा मारुता’ नाम की कन्नड़ फिल्म पर काम शुरू हुआ था। स्नेहलता इस फिल्म का हिस्सा थीं। लेकिन गिरफ्तारी और फिर उनकी मौत के कारण वह इसकी रिलीज नहीं देख सकीं।
फिल्म आपातकाल खत्म होने के बाद 1977 में रिलीज हुई।
जिस कलाकार ने अपने अभिनय से पर्दे पर अलग पहचान बनाई, उसकी जिंदगी का अंतिम अध्याय जेल, बीमारी और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच समाप्त हुआ।
2026 में फिर चर्चा में आया नाम
2 मई 2026 को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने स्नेहलता रेड्डी की गिरफ्तारी की 50वीं वर्षगांठ के संदर्भ में उनकी कहानी को फिर उठाया। उन्होंने आपातकाल को लोकतंत्र का काला अध्याय बताते हुए दावा किया कि स्नेहलता के साथ जेल में अमानवीय व्यवहार किया गया और उनकी रिहाई के कुछ दिन बाद हुई मौत को “शहादत” के रूप में याद किया।
हालांकि उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में स्नेहलता रेड्डी को भारत सरकार की ओर से औपचारिक रूप से ‘शहीद’ का दर्जा दिए जाने की पुष्टि नहीं होती। इसलिए उन्हें “इकलौती एक्ट्रेस जिसे शहीद का दर्जा मिला” कहना तथ्यात्मक रूप से पुष्ट नहीं है।
उनकी वास्तविक कहानी अपने आप में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है—एक सफल अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता, जिसे आपातकाल में गिरफ्तार किया गया, महीनों तक बिना मुकदमे जेल में रखा गया, जिसकी सेहत हिरासत में बुरी तरह बिगड़ी और जो रिहाई के सिर्फ पांच दिन बाद दुनिया से चली गई।
स्नेहलता रेड्डी की मौत को करीब पांच दशक बीत चुके हैं, लेकिन उनका नाम आज भी आपातकाल, नागरिक स्वतंत्रता, जेल में मानवाधिकार और सत्ता के विरोध की कीमत से जुड़ी बहस में सामने आता है।