केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की यह घोषणा कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले NDA-शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू हो जाएगी, कोई हैरानी की बात नहीं है। अहम बात घोषणा नहीं, बल्कि BJP द्वारा चुना गया रास्ता है। उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना।
गुजरात, असम और BJP-शासित कई अन्य राज्यों ने भी इसी दिशा में कदम उठाए हैं। इससे पता चलता है कि पार्टी ज़रूरी नहीं कि कोई एक केंद्रीय कानून चाहती हो या उसकी उम्मीद करती हो।
संसद के ज़रिए पूरे देश में UCC लागू करने की घोषणा करना आसान है, लेकिन उसे असल में लागू करना मुश्किल है। अगर इसके लिए संविधान में संशोधन की ज़रूरत पड़ती है, तो कानून को संसद के दोनों सदनों से मंज़ूरी लेनी होगी और फिर राज्य विधानसभाओं से ज़रूरी समर्थन हासिल करना होगा। इस मुश्किल के बिना भी, भारत की अद्भुत विविधता के अनुकूल कानून का मसौदा तैयार करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।
आदिवासी इलाकों में चुनौतियां
आदिवासी इलाकों में यह समस्या और भी जटिल हो जाती है। संविधान आदिवासी समुदायों के लिए सुरक्षा उपाय करता है, जिनके पारंपरिक कानून और रीति-रिवाज बाकी जगहों से अलग हैं। ऐसा समान कानून जो इन सुरक्षा उपायों को नज़रअंदाज़ करता है, उसे कानूनी और राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
शायद BJP को एक राजनीतिक रूप से सुविधाजनक विकल्प मिल गया है। अलग-अलग राज्य स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए UCC का अपना संस्करण लागू कर सकते हैं। यह तरीका धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों के बढ़ते चलन जैसा ही है।
धर्मांतरण पर एक समान केंद्रीय कानून बनाना मुश्किल होगा, इसलिए BJP-शासित राज्यों ने अपने-अपने कड़े कानून लागू किए हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि नागरिक जीवन में एकरूपता के कुछ तत्व पहले से ही मौजूद हैं।
शादियों का रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी है। जन्म और मृत्यु का भी। दहेज और संपत्ति में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानून धर्म से परे सभी पर लागू होते हैं। असली सवाल यह है कि और कितनी एकरूपता चाहिए और क्या वह ज़रूरी है।
गोवा के मॉडल में कमियां हैं
अक्सर UCC के उदाहरण के तौर पर गोवा का ज़िक्र किया जाता है, लेकिन पुर्तगाली शासन से मिली उसकी व्यवस्था पूरी तरह से एकरूपता का मॉडल नहीं है। यह कुछ खास परिस्थितियों में हिंदू पुरुष को दूसरी पत्नी रखने की इजाज़त देता है, अगर पहली शादी से कोई बच्चा न हो।
कुछ और भी जटिलताएं हैं। हिंदू अविभाजित परिवारों को कुछ टैक्स फ़ायदे मिलते हैं जो दूसरे धर्मों के मानने वालों को नहीं मिलते। एक सचमुच समान नागरिक संहिता को ऐसी विसंगतियों का भी सामना करना होगा। खतरा यह है कि कानून और सामाजिक सुधार से जुड़े एक जटिल मुद्दे को महज एक राजनीतिक नारे में न बदल दिया जाए। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बिहार समेत NDA-शासित सभी राज्य इस विचार को उसी रूप में आसानी से स्वीकार कर लेंगे।
एकरूपता से बंटवारा नहीं होना चाहिए
सिविल कानून में एकरूपता एक जायज संवैधानिक लक्ष्य हो सकता है। लेकिन इसे राजनीतिक लामबंदी या बहुसंख्यकवाद के दावे का जरिया नहीं बनना चाहिए। शादी, परिवार, विरासत और व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े कानून को नागरिकों को एकजुट करना चाहिए, न कि पहले से ही विविधतापूर्ण समाज में कोई नई दरार पैदा करनी चाहिए।