बेलगाम अपराध

किसी अपराध के संदर्भ में पुलिस या प्रशासन की ओर से बरती गई लापरवाही पर सवाल उठने का सबक यह होना चाहिए

Update: 2020-10-15 02:49 GMT
जनता से रिश्ता वेबडेस्क। किसी अपराध के संदर्भ में पुलिस या प्रशासन की ओर से बरती गई लापरवाही पर सवाल उठने का सबक यह होना चाहिए कि कम से कम भविष्य में वैसा ही नहीं हो। लेकिन उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ समय से लगातार जिस तरह के अपराध सामने आ रहे हैं, उससे यही लगता है कि सरकार और पुलिस को इन पर काबू पाना शायद प्राथमिक दायित्व नहीं लग रहा है। हाल में हाथरस में एक युवती के साथ जिस प्रकृति का अपराध हुआ था, उसने तमाम लोगों को झकझोर दिया और व्यापक पैमाने पर इसके खिलाफ आक्रोश उभरा। ऐसे आक्रोश के पीछे यह उम्मीद भी होती है कि अपराध पर काबू पाना चूंकि पुलिस और प्रशासन के रवैये पर ही निर्भर है तो वह अपनी ड्यूटी को लेकर सक्रिय और ईमानदार होगी। लेकिन अब गोंडा जिले के पक्का गांव में दलित परिवार की तीन बहनों पर रात में सोते समय जिस तरह तेजाब से हमला किया गया, उससे साफ जाहिर है कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के भीतर कानून का डर नहीं रह गया है! हमले में बड़ी बहन गंभीर रूप से झुलस गई और बाकी दोनों बहनें भी घायल हो गर्इं। इस मामले में बच्चियों के पिता ने कहा कि गांव में उनकी किसी से रंजिश नहीं थी। हालांकि इस आरोप में एक युवक को पकड़ा गया है और तथ्य यह है कि तीनों बहनों पर तेजाब से हमला हुआ।

सवाल है कि अगर कोई रंजिश नहीं थी तो क्या अपराधी ने महज कमजोर और दमित-शोषित तबकों के भीतर भय और दबाव के मनोविज्ञान को बनाए रखने के लिए इस तरह का हमला किया! यह किस तरह का समाज बन रहा है कि महज वर्चस्व की कुंठा के चलते या किसी को दबाए रखने के मकसद से कुछ लोग दलितों या कमजोर तबकों के खिलाफ आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं! विडंबना यह भी है कि राज्य की पुलिस का जो रवैया रहा है, उसकी वजह से आपराधिक मानस वाले लोगों का मनोबल बढ़ा है और वे पुलिस की बहुत ज्यादा फिक्र नहीं कर रहे हैं। लेकिन एक सवाल यह भी है कि अगर लंबे समय तक पुलिस और प्रशासन ने ऐसे अपराधों की ओर से अपनी आंखें मूंदे रखीं तो आने वाले वक्त में उनकी मौजूदगी की क्या अहमियत रह जाएगी! पुलिस की यह प्राथमिक ड्यूटी होनी चाहिए कि समाज में कमजोर और सताए हुए तबकों या पीड़ितों के हक में वह बिना किसी हिचक के खड़ी हो और उन्हें इंसाफ मिलना सुनिश्चित कराए। लेकिन आमतौर पर उसका रवैया क्या होता है! चित्रकूट जिले में हुई एक अन्य घटना में सामूहिक बलात्कार की पीड़ित एक दलित किशोरी ने मंगलवार को इसलिए क्षुब्ध होकर आत्महत्या कर ली कि पुलिस ने समय पर उसका मामला दर्ज नहीं किया था।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी भी अपराध के बाद पुलिस का शुरुआती रुख और उसके द्वारा दर्ज मामले का स्वरूप ही आखिकार अदालत के अंतिम फैसले को प्रभावित करता है। लेकिन समाज के कमजोर तबकों या दलित-वंचित जातियों के प्रति पुलिस अगर इस तरह के रवैये के साथ काम करती है तो न्याय सुनिश्चित हो पाने को लेकर सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश पहले ही कठघरे में खड़ा है। राज्य सरकार दावा तो अक्सर करती है कि वह अपराधियों के खिलाफ सख्त कदम उठा रही है, लेकिन अगर पुलिस, प्रशासन या सरकार ने अपराधों पर काबू पाने के लिए वास्तव में कुछ नहीं किया तो न केवल उसकी विश्वसनीयता कठघरे में होगी, बल्कि समाज के कमजोर तबकों से इंसाफ दूर होता जाएगा। फिर यह सवाल उठेगा कि सरकार आखिर किसके लिए है!

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