डॉ. अनुराधा पी. एस. द्वारा
कर्नाटक अगली पीढ़ी के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को आकर्षित करने के प्रयास कर रहा है। राज्य की हाल ही में मंजूर की गई 'सस्टेनेबल डेटा सेंटर पॉलिसी 2026-31' का लक्ष्य 2031 तक 1 GW का कुल डेटा सेंटर IT लोड हासिल करना है, जो भारत के कुल डेटा सेंटर IT लोड का 10-12 प्रतिशत होगा। इस नीति का बजट लगभग 1,300 करोड़ रुपये है और इसमें विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, उन्नत कूलिंग, जल प्रबंधन और जल-संसाधन दक्षता को शामिल किया गया है।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल अर्थव्यवस्था की अगली लहर में केवल सॉफ्टवेयर और सर्वर ही नहीं होंगे। इसे बिजली, जमीन, कनेक्टिविटी और तेजी से बढ़ती पानी की जरूरत से ताकत मिलेगी। लेकिन सवाल यह नहीं है कि कर्नाटक को डेटा सेंटरों को आकर्षित करना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि राज्य यह कैसे सुनिश्चित करेगा कि उसका डिजिटल विजन पानी की कमी से जुड़ी उसकी समस्याओं को और न बढ़ा दे।
अदृश्य संसाधन
सभी सर्च, क्लाउड सेवाएं, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और AI एप्लिकेशन भौतिक कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करते हैं। सर्वर से गर्मी पैदा होती है, इसलिए कूलिंग बहुत जरूरी है। तकनीक और काम करने की स्थितियों के आधार पर, कूलिंग के लिए काफी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ सकती है। AI के बढ़ते चलन और हाई-परफॉरमेंस कंप्यूटिंग की मांग के साथ यह मुद्दा और भी अहम होता जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2020 में 375 MW से बढ़कर 2025 तक 1,500 MW से अधिक हो गई है। सरकार पानी और ऊर्जा बचाने के लिए नई तकनीकों पर भी जोर दे रही है, जैसे कि डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, इमर्शन कूलिंग और एडियाबेटिक कूलिंग।
कोई एक आंकड़ा सभी डेटा सेंटरों के 'वॉटर फुटप्रिंट' (पानी की खपत) को सही ढंग से नहीं दिखा सकता। पानी की खपत कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे कि जलवायु, कूलिंग तकनीक, सर्वर की सघनता (डेंसिटी) और उनका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है। 'वॉटर यूसेज इफेक्टिवनेस' (WUE) एक नया पैमाना है जो महत्वपूर्ण होता जा रहा है। कर्नाटक की नई नीति में WUE और 'पावर यूसेज इफेक्टिवनेस' (PUE) की निगरानी करने का प्रस्ताव है। यह एक अच्छी शुरुआत है। हालांकि, इन पैमानों का सही मतलब तभी निकलेगा, जब इनका इस्तेमाल यह तय करने में भी किया जाए कि डेटा सेंटर कहां और कैसे बनाए जाएं।
कर्नाटक की दुविधा
समय बहुत मायने रखता है। कर्नाटक एक तरफ तेजी से डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ उसे बार-बार पानी की कमी (वॉटर स्ट्रेस) जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा है। रिपोर्टों से पता चलता है कि राज्य ने 25 वर्षों में 17वीं बार सूखे की घोषणा की है, जो कई इलाकों में पानी की लगातार बनी हुई समस्या को दर्शाती है। यह एक ऐसी योजनागत समस्या है जिसे डेटा सेंटरों से कम पानी इस्तेमाल करने के लिए कहकर हल नहीं किया जा सकता। कोई सुविधा (फैसिलिटी) पानी का बहुत कुशलता से इस्तेमाल कर सकती है, लेकिन फिर भी वह ऐसे इलाके में स्थित हो सकती है जहाँ पानी की भारी कमी है। इसके विपरीत, कोई ऐसी जगह जहाँ पानी के संसाधन, नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत और कनेक्टिविटी अधिक उपलब्ध हों, वह लंबे समय के लिए एक अधिक टिकाऊ विकल्प साबित हो सकती है।
पानी के प्रति जागरूक होकर जगह का चुनाव करना, दक्षता के मानक तय करना, उपचारित अपशिष्ट जल (ट्रीटेड वेस्टवॉटर) का उपयोग, लचीलेपन के मानक और पानी के संसाधनों के अद्यतन नक्शे—ये सब कर्नाटक को डिजिटल विस्तार और जल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकते हैं। कर्नाटक का लक्ष्य 2031 तक 1 GW (गीगावाट) का डेटा सेंटर IT लोड हासिल करना है।
यही कारण है कि जगह का चुनाव (लोकेशन) टिकाऊपन नीति (सस्टेनेबिलिटी पॉलिसी) का एक अहम हिस्सा होना चाहिए। सही जगह चुनने में मदद के लिए, नई नीति में जमीन, बिजली, पानी और कनेक्टिविटी जैसे संसाधनों की उपलब्धता की मैपिंग करने का प्रस्ताव है। इसमें टिकाऊ डेटा-सेंटर ज़ोन और पार्क विकसित करने की भी परिकल्पना की गई है। अगर इसे खुले और निष्पक्ष तरीके से लागू किया जाए, तो यह इस नीति के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक साबित हो सकता है।
संसाधनों की अनदेखी से आगे बढ़ना
बेंगलुरु के बाहर डेटा सेंटरों का विस्तार करने की कर्नाटक सरकार की पहल, डेटा सेंटरों के विकास के पारंपरिक तरीकों पर फिर से विचार करने का एक मौका देती है। जगह बदलने का मतलब सिर्फ एक शहर की भीड़-भाड़ को दूसरे शहर में ले जाना नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, इसे मैसूरु और मंगलुरु जैसी उभरती जगहों पर विकास को बढ़ावा देना चाहिए। जगह का चुनाव एक व्यापक संसाधन मैट्रिक्स (resource matrix) के आधार पर होना चाहिए, जिसमें पानी की उपलब्धता, भूजल की स्थिति, नवीकरणीय ऊर्जा की संभावना, ग्रिड क्षमता, कनेक्टिविटी, जलवायु जोखिम और आसपास के समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि WRI इंडिया के एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि भारत के आधे से अधिक डेटा सेंटर ऐसे इलाकों में स्थित हैं, जहाँ पानी की भारी कमी है।
कर्नाटक उन पाँच राज्यों में से एक है, जहाँ देश के कुल डेटा सेंटरों का 75 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। इसका मतलब यह नहीं है कि पानी की कमी वाले राज्यों में डेटा सेंटर नहीं होने चाहिए। बल्कि, बुनियादी ढांचे की योजना ऐसी होनी चाहिए जो लचीली हो और स्थानीय संसाधनों की स्थिति के प्रति संवेदनशील हो।
पानी एक शर्त
कर्नाटक अपनी नई नीति के साथ एक कदम और आगे बढ़ सकता है।
पहला, जमीन आवंटित करने से पहले पानी की उपलब्धता का आकलन किया जाना चाहिए। किसी बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले, राज्य को जल संतुलन, भूजल की स्थिति, पानी की अन्य प्रतिस्पर्धी मांगों और जलवायु संबंधी जोखिमों पर विचार करना चाहिए।
दूसरा, WUE (जल उपयोग दक्षता) को प्रदर्शन मापने का एक पैमाना (परफॉरमेंस मीट्रिक) बनाया जाना चाहिए। प्रोत्साहन (इंसेंटिव) केवल वादा की गई तकनीक पर नहीं, बल्कि जल दक्षता (वाटर एफिशिएंसी) पर आधारित होने चाहिए।
तीसरा, जहां भी संभव हो, उपचारित अपशिष्ट जल (ट्रीटेड वेस्टवॉटर) के उपयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। डेटा सेंटर को ठंडा करने के लिए हमेशा ताजे पानी (फ्रेशवॉटर) की जरूरत नहीं होती। पानी को रीसाइकिल और दोबारा इस्तेमाल करने से भूजल भंडार और नगर निगम की जलापूर्ति पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है।
चौथा, कर्नाटक बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स के लिए 'जल-लचीलापन' (वाटर-रेजिलिएंस) संबंधी नियम लागू कर सकता है। एक निश्चित सीमा से बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए, अपशिष्ट जल रीसाइक्लिंग, भूजल रिचार्ज, या स्थानीय स्तर पर पानी की सुरक्षा से जुड़े अन्य उपायों में निवेश करना अनिवार्य किया जा सकता है।
अंत में, प्रस्तावित 'संसाधन मानचित्र' (रिसोर्स मैप) गतिशील (डायनामिक) होना चाहिए। पानी की उपलब्धता कोई स्थिर भौगोलिक विशेषता नहीं है। आज जो जिला उपयुक्त लग रहा है, वह जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि और औद्योगिक मांगों में बदलाव के कारण भविष्य में पानी के भारी संकट का सामना कर सकता है। इसलिए, साइट चुनने के लिए इस्तेमाल होने वाले नक्शों को केवल एक बार का निवेश नहीं मानना ​​चाहिए, बल्कि उन्हें नियमित रूप से अपडेट करते रहना चाहिए।
आर्थिक अवसर
पानी पर आधारित टिकाऊ कूलिंग सिस्टम विकसित करना, अपशिष्ट जल का दोबारा इस्तेमाल करना, गर्मी का प्रबंधन करना और कम कार्बन उत्सर्जन वाले डेटा सेंटर डिजाइन करना—ये सब कर्नाटक के लिए विशेष विशेषज्ञता के क्षेत्र बन सकते हैं। राज्य 'ग्रीन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर' के लिए एक ऐसा माहौल तैयार कर सकता है, जिसमें तकनीकी कंपनियां, इंजीनियरिंग फर्म, विश्वविद्यालय, स्टार्टअप और सार्वजनिक उपयोगिता सेवाएं शामिल हों। इससे एक बाधा, नवाचार (इनोवेशन) के अवसर में बदल जाएगी।
कर्नाटक में डेटा सेंटरों का भविष्य केवल सर्वर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर आधारित अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे को तैयार करने के बारे में है। राज्य को डिजिटल विकास और जल सुरक्षा में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसे यह समझना होगा कि ये दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। एक टिकाऊ डेटा सेंटर नीति की असली पहचान गीगावाट की संख्या से नहीं होगी। बल्कि, यह इस बात से तय होगी कि क्या राज्य यह साबित कर सकता है कि हर नए गीगावाट के लिए उसे टिकाऊ तरीके से चलाने हेतु जरूरी संसाधन मौजूद हैं। 'अदृश्य जल बिल' (पानी की छिपी हुई खपत) डिजिटल कर्नाटक के भविष्य का आधार नहीं हो सकता।
Tags: