कुपोषण से लड़ने का एक प्रभावी हथियार: बायोफोर्टिफिकेशन
कुपोषण से लड़ने का एक प्रभावी हथियार
पिछले कुछ वर्षों में कृषि उत्पादन में तेजी से प्रगति के बावजूद, भारत को अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) की कमी शामिल है, जिसे विशेषज्ञ 'छिपी हुई भूख' (हिडन हंगर) कहते हैं। 1960 के दशक की 'हरित क्रांति' ने, जिसमें अधिक उपज देने वाली किस्मों और बेहतर कृषि तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनने में मदद तो की, लेकिन अधिक उपज पर जोर देने के चक्कर में अक्सर पोषण की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ा। आहार में सूक्ष्म पोषक तत्वों के महत्व के बारे में लोगों में जागरूकता भी अभी काफी कम है।
यहीं पर 'बायोफोर्टिफिकेशन' (biofortification) कुपोषण से निपटने में एक अहम भूमिका निभा सकता है। फसल बायोफोर्टिफिकेशन—यानी खेती के दौरान ही फसलों में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने की प्रक्रिया—एक टिकाऊ, किफायती और दीर्घकालिक समाधान प्रदान करती है। इसमें पारंपरिक पादप प्रजनन (plant breeding) के जरिए खाद्य फसलों में आयरन, जिंक, विटामिन A और प्रोटीन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाकर उनकी पोषण गुणवत्ता में सुधार किया जाता है। 'इंडस्ट्रियल फोर्टिफिकेशन' (जिसमें प्रोसेसिंग के दौरान पोषक तत्व मिलाए जाते हैं) या 'सप्लीमेंटेशन' (जिसमें गोलियों के जरिए पोषक तत्व दिए जाते हैं) के विपरीत, बायोफोर्टिफिकेशन का लक्ष्य फसलों को प्राकृतिक रूप से ही जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर बनाना है। भारत में 60% से अधिक लोग अनाज पर आधारित आहार लेते हैं। अगर मुख्य खाद्य पदार्थों में ही आयरन, जिंक या प्रोटीन मौजूद हों, तो लोगों को अपनी खान-पान की आदतों में कोई बड़ा बदलाव किए बिना, रोजमर्रा के भोजन के जरिए ये पोषक तत्व मिल सकते हैं। हाल के NFHS (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में लगभग 67% बच्चे और आधी से अधिक महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं। इसके अलावा, बड़ी संख्या में लोगों में जिंक, विटामिन A और प्रोटीन की भी कमी है। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने अब तक 15 तरह की फसलों (जैसे चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा, सोयाबीन और मूंगफली) की 205 से अधिक बायोफोर्टिफाइड किस्में विकसित की हैं और जारी की हैं। अब जरूरत है कि इन्हें और अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए और लोकप्रिय बनाया जाए।
फसल बायोफोर्टिफिकेशन से जुड़े शोध प्रकाशनों के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है। इस शोध का असर जमीनी स्तर पर भी देखने को मिला है और इन फसलों को काफी हद तक अपनाया गया है। हालांकि, उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी, बीजों की उपलब्धता में असमानता, बाजार से कमजोर जुड़ाव और पोषण कार्यक्रमों में इनका पर्याप्त रूप से शामिल न होना, बायोफोर्टिफाइड फसलों की पहुंच को सीमित कर रहा है।
इन बाधाओं को दूर करने के लिए कृषि अनुसंधान, विस्तार सेवाओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य और खाद्य प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। सप्लीमेंटेशन (पूरक आहार) और खाद्य फोर्टिफिकेशन (खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व बढ़ाना) जैसे कार्यक्रमों के विपरीत, जिनमें लगातार निवेश की आवश्यकता होती है, बायोफोर्टिफाइड बीजों को बार-बार बोया और उगाया जा सकता है, जिससे ये बहुत किफायती साबित होते हैं। बायोफोर्टिफाइड किस्मों को लोकप्रिय बनाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), PM पोषण (मिड-डे मील) और आंगनवाड़ी पूरक पोषण जैसे सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रमों में शामिल किया जाए।
वैज्ञानिक तरीके से फसलों को विकसित करने, संस्थागत खरीद और लक्षित विस्तार सेवाओं को एक साथ लाकर, बायोफोर्टिफिकेशन भारत के कृषि उत्पादन को केवल मात्रा (टन) से बदलकर, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा के एक टिकाऊ आधार में बदल सकता है। फसल बायोफोर्टिफिकेशन, भारत के सामने मौजूद कुपोषण और भूख की दोहरी चुनौतियों के लिए एक टिकाऊ, किफायती और कृषि-आधारित समाधान प्रदान करता है। बायोफोर्टिफाइड फसलों को कृषि प्रणालियों, सार्वजनिक पोषण कार्यक्रमों और उपभोक्ता बाजारों में शामिल करके, भारत पोषण संबंधी परिणामों में सुधार कर सकता है, खाद्य सुरक्षा को मजबूत कर सकता है, और 'शून्य भूख' (जीरो हंगर) तथा 'अच्छे स्वास्थ्य' से जुड़े सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसकी सफलता अनुसंधान, बीज वितरण, जागरूकता पैदा करने, नीतिगत समर्थन और प्रभावी बाजार विकास जैसे समन्वित प्रयासों पर निर्भर करेगी।