संदेह में बदल गयी है हमारी नागरिकता

नागरिकता

Update: 2026-07-01 05:27 GMT

आजादी के 79 साल बाद, हर बार झंडा फहराते हुए आत्मविश्वासी भारतीय गणराज्य के वादों के बाद भी, हर भारतीय को राष्ट्र से जोड़ने वाली अटूट कड़ी के रूप में बेची गयी डिजिटल पहचान पर अरबों खर्च करने के बाद भी, भारतीय आज तक ऐसे दस्तावेजों को पकड़े हुए हैं, जिन्हें अब खुद सरकार ही बारिश में भीगते कागज के टुकड़ों जैसा मानती है. एक साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक आरोपी घुसपैठिए को जमानत देने से इनकार करते हुए साफ कहा था कि आधार, पैन और वोटर आइडी नागरिकता साबित नहीं करते. सुप्रीम कोर्ट ने समानांतर कार्यवाही में आधार के बारे में यही कठोर सच्चाई दोहरायी.

यहीं से पीड़ा शुरू हुई. अगर पहचान के ये प्रतीक कानूनी जांच में ढह जाते हैं, तो फिर उस भारत का क्या बचता है, जिसका हिस्सा होने का भारतीयों ने विश्वास किया था? इस घाव को विदेश मंत्रालय ने अब और गहरा कर दिया है. पासपोर्ट सेवा दिवस पर उसने घोषणा की कि भारतीय पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और नागरिकता के प्रमाण के रूप में इसका कोई निर्णायक महत्व नहीं है. उस मंत्रालय ने, जो पासपोर्ट अधिनियम के तहत यह दस्तावेज जारी करता है, इसे सार्वजनिक रूप से नागरिकता से अलग कर दिया है. पीड़ा इसलिए और गहरी हो जाती है, क्योंकि इसका अनुभव उन तमाम लोगों को हो रहा, जिन्होंने पासपोर्ट सेवा केंद्र पर कतार लगायी, बायोमीट्रिक दिया और यह विश्वास लेकर बाहर निकला कि नीली किताब उसके राष्ट्र में निश्चित जगह की पुष्टि करती है.
पासपोर्ट अधिनियम की प्रस्तावना भी साफ कहती है कि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को दिया जायेगा. फिर भी अब विदेश मंत्रालय आम भारतीयों से कह रहा है कि उनका पासपोर्ट उनके बारे में कुछ भी साबित नहीं करता. यह कानून का विकास नहीं है. यह उसी विश्वासघात का विस्तार है, जिसे अदालतों ने एक साल पहले उजागर किया था. पहले प्लास्टिक और डिजिटल पहचान को अर्थहीन बना दिया गया. अब भारत के सबसे गंभीर यात्रा दस्तावेज को भी उसी खोखले प्रमाणों की सूची में जोड़ दिया गया है. यह यातना केवल सैद्धांतिक नहीं है. यह उन परिवारों की शांत घबराहट में दिखती है, जिनकी जड़ें विभाजन से पहले के भारत तक जाती हैं, जिनके कागज समय के साथ खो गये, और जो अब सोचते हैं कि क्या पिछले साल नवीनीकृत किया गया उनका पासपोर्ट भी अगली जांच में टिक पायेगा.
विरोधाभास अदालत की किसी भी टिप्पणी से अधिक गहरे हैं. जब यही विदेश मंत्रालय विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए मिशन प्रमुख नियुक्त करता है, तब वह उन्हें सेवा रिकॉर्ड और उसी पासपोर्ट के आधार पर राजनयिक पासपोर्ट देता है, जिसे वह अब खारिज कर रहा है. विदेशी सरकारें बिना किसी अतिरिक्त प्रमाण के इन प्रमाणपत्रों को स्वीकार करती हैं. संसद और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य अपने नामांकन पत्रों के माध्यम से नागरिकता घोषित करते हैं, जो मुख्य रूप से मतदाता पंजीकरण प्रमाणपत्रों पर आधारित होते हैं. कोई अलग नागरिकता प्रमाणपत्र न तो मांगा जाता है और न ही पेश किया जाता है. अगर पासपोर्ट और वोटर आइडी किसी की भारतीयता साबित नहीं कर सकते हैं, तो ये प्रतिनिधि देश के लिए बोलने या कानून बनाने के योग्य कैसे हैं? राज्य शासकों को चुपचाप मान्यता देता है, जबकि शासितों से लगातार कठिन प्रमाण मांगता है. यह असमानता आम नागरिकों को असुरक्षित छोड़ती है और राजनीतिक वर्ग को बचाती है.
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने इस विभाजन को और तेज कर दिया है. विपक्षी नेताओं ने विदेश मंत्रालय के बयान को जानबूझकर भ्रम पैदा करने का प्रमाण बताया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘हर भारतीय के खिलाफ संदेह का माहौल बनाने’ की कोशिश कहा, ताकि सरकार मतदाता सूची से नाम हटाने को उचित ठहरा सके. पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे एक ‘खतरनाक खेल’ बताया, जो पीढ़ियों से यहां रहने वाले नागरिकों की पहचान पर सवाल उठाता है. इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं ने भी यही कहा. बिहार और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन के दौरान विपक्ष ने जब चुनाव आयोग की सख्ती की आलोचना की थी, तब सरकार और भाजपा के नेताओं ने उसका कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि यह कोई नयी बात नहीं है.
आंकड़े भ्रम की व्यापकता दिखाते हैं. लगभग 2.5 फीसदी भारतीयों के पास ही पासपोर्ट है. सरकार ने आधार बनाने में 12,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किये, और यह बैंकिंग, कर और यात्रा के लिए अनिवार्य है. फिर भी जब नागरिकता की बात आती है, तो इसे अप्रासंगिक बता दिया जाता है. हर दशक में सरकारी प्रयास से तैयार होने वाला नागरिक रजिस्टर 2011 के बाद से स्थिर है. विदेश में नौकरी के लिए आवेदन करने वाला युवा अब सोचता है कि क्या उसका पासपोर्ट पर्याप्त होगा. इसका असर सीमाओं से परे जाता है. जब खुद केंद्र सरकार कहती है कि उसका पासपोर्ट नागरिकता साबित नहीं करता, तो विदेशी अधिकारी भारतीयों से अतिरिक्त प्रमाण मांगने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं. पहचान एक अंतहीन जांच बन गयी है और नागरिकता संदेह में बदल गयी है. यह नया झटका निजी चिंता को सार्वजनिक नीति में बदल देता है.
यह ऐसे समय में आया है, जब गृह मंत्रालय इस मूल प्रश्न पर चुप है कि नागरिकता का प्रमाण आखिर है क्या. नतीजा यह है कि प्रणाली ऐसे प्रमाण मांगती है, जो करोड़ों लोग आसानी से नहीं दे सकते, और फिर उन्हीं प्रमाणों को खारिज कर देती है, जिन्हें उसने खुद बनाया. इसका उद्देश्य सैद्धांतिक शुचिता नहीं, बल्कि घनघोर राजनीतिक समय में भ्रम पैदा करना लगता है. भारत को इस लोकतांत्रिक अपमान का खात्मा करना होगा. उसे अमेरिका और जर्मनी की तरह एक एकल, संप्रभु नागरिक कार्ड जारी करना चाहिए, जो नागरिकता, मतदाता पात्रता और पहचान को एक ही सुरक्षित दस्तावेज में स्थापित करे. अन्य देशों ने यह समस्या बहुत पहले सुलझा ली. भारत ने दशकों तक और भारी धन खर्च कर बिखरी हुई प्रणालियां बनायी हैं, जिन्हें राज्य कभी भी बेकार घोषित कर सकता है. जब तक यह एकल कार्ड नहीं आता, तब तक करोड़ों भारतीय अपने दस्तावेजों को केवल यह सुनने के लिए ताबीज की तरह पकड़े रहेंगे कि वे प्लास्टिक के टुकड़े हैं. सबसे कठोर सच्चाई यह है कि आजादी के 79 साल बाद भी यह सवाल अनुत्तरित है कि भारतीय कौन है. अभी के लिए तो मैं एक मतदाता हूं, लेकिन भविष्य का क्या?
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