कर्मचारियों की मानसिक समस्याएं

Update: 2025-06-18 12:19 GMT
वर्कप्लेस पर ऐसा माहौल तैयार करने की जरूरत है, जिसमें कर्मचारी बिना किसी अंदेशे के अपने विचार साझा कर सकें। ऐसा माहौल सबके लिए फायदेमंद होता है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें सहज माहौल में बातचीत के जरिए दफ्तरों के अंदर के कई जटिल मसले आसानी से हल कर लिए गए। काम करने में आजादी महसूस करना भी पॉजिटिव माहौल के लिए आवश्यक होता है। जब कोई कर्मचारी स्वतंत्र रूप से काम करता है, तो वह अपना पूरा प्रयास लगाता है। ऐसे में उसका प्रदर्शन तो अच्छा होता ही है, मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी इसके फायदे मिलते हैं। ऐसा सिस्टम विकसित करने की जरूरत है कि कर्मचारियों में किसी प्रकार का तनाव न हो। वे खुद को दबाव में न महसूस करें। जब कोई व्यक्ति मानसिक रूप से आश्वस्त रहता है, तो उसमें अपमान या शर्म महसूस करने जैसी बात नहीं होती…
एक ताजा मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देश में अधिकतर कर्मचारी गंभीर बीमारियों, मानसिक तनाव और थकावट से जूझ रहे हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 40 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते अधिकतर कर्मचारियों को गंभीर बीमारियां होने लगती हैं। 40 प्रतिशत कर्मचारी हर महीने मानसिक तनाव की वजह से छुट्टी लेते हैं। हर 5 में से 1 कर्मचारी थकावट की वजह से नौकरी छोडऩे पर विचार कर रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, आजकल बड़ी और खतरनाक बीमारियां 30 की उम्र के बाद जल्दी-जल्दी लोगों को होने लगी हैं। आम तौर पर किसी सामान्य व्यक्ति का सबसे ज्यादा समय वर्कप्लेस पर ही बीतता है। स्वाभाविक ही वर्कप्लेस का बिगड़ा माहौल बड़ी संख्या में लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बना रहा है। वर्कप्लेस के बिगड़े माहौल का मतलब उन हालात से है, जिनमें कर्मचारियों को लगातर दबाव में काम करना पड़ता है, काम की वजह से वे खुद को हमेशा तनाव में महसूस करते हैं। आम तौर पर इसके लिए काम लेने का दोषपूर्ण अंदाज जिम्मेदार होता है। भारत की ही कई हालिया रिपोर्टों में मानसिक तनाव के कारण कॉरपोरेट अधिकारियों पर पडऩे वाले प्रभावों को उजागर किया गया है। हार्ट की बीमारी औसतन 32 साल की उम्र में शुरू हो रही है। कैंसर की जानलेवा बीमारी लगभग 33 साल की उम्र में लोगों में पाई जा रही है। डायबिटीज करीब 34 साल की उम्र में लोगों में शुरू हो रही है। किडनी जैसी गंभीर बीमारी 35 साल की उम्र में सामने आ रही है। दिमाग से जुड़ी बीमारियां, जैसे स्ट्रोक, ब्रेन में ब्लड सप्लाई रुकना आदि 36 साल की उम्र में हो रही हैं। कम उम्र में गंभीर बीमारियां होने से लोगों की सेहत जल्दी खराब हो रही है, जिससे उनका निजी जीवन और काम करने की क्षमता दोनों पर असर पड़ता है। इससे हेल्थकेयर सिस्टम पर बोझ पड़ता है और कहीं न कहीं इसका असर देश की आर्थिक तरक्की पर भी पड़ता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। सबसे बड़ी चिंता एंग्जायटी की समस्या है। इससे जुड़ी सच्चाई जानने की कोशिश करते हैं।
समय के साथ लोगों के काम करने के तरीकों में भी बदलाव आया है। ऑफिस में 9 से 5 की जॉब कब नौ से दस घंटे की बन जाती है, लोगों को पता ही नहीं चल पाता है। अपने दिन का ज्यादातर समय ऑफिस में बिताने के चलते इस माहौल में बढ़ते स्ट्रेस का असर लोगों की मानसिक स्थिति को खराब करने का एक मुख्य कारण बनता है। दरअसल, प्रोमोशन और सैलरी के ग्राफ को लगातार बढ़ाने के लिए लोग दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करते हैं। ऐसे में कई बार उनको स्ट्रेस, तनाव और कई प्रोजेक्ट के सही तरह से वर्क न करने के चलते तनाव का भी शिकार होना पड़ता है। कार्यस्थल पर तनाव के कारण की वजह से लगातार थकान, नींद में कमी, पेट की समस्या, घबराहट, चिड़चिड़ापन और काम में फोकस न कर पाने के लक्षण महसूस होते हैं। यह तनाव अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी बीमारियों के खतरे को भी बढ़ा सकता है। ऐसा क्यों हो रहा है? सबसे पहले, जब काम का बोझ अत्यधिक बढ़ जाता है और काम के टारगेट को पूरा करने के लिए समय सीमा कम होती है, तो यह स्ट्रेस का मुख्य कारण बन सकता है। जब व्यक्ति को सही दिशा-निर्देश और संसाधन नहीं मिलते हैं, तो उसको तनाव होने लगता है, जिससे व्यक्ति काम में असफल महसूस करता है। ऑफिस में जॉब की जिम्मेवारी भी आपके तनाव का कारण बन सकती है। इसके अलावा, कर्मचारियों को रिस्पोंसिबिलिटी न देना और कभी कमर्चारी पर ज्यादा वर्क लोड डालना भी स्ट्रेस का कारण बन सकता है। ऑफिस में काम के प्रेशर और देर रात तक काम करने के चलते व्यक्ति घर और ऑफिस की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल नहीं बना पाता है। ऐसे में भी उसको वर्क स्ट्रेस हो सकता है। इसके अलावा, ऑफिस में सहकर्मियों के साथ होने वाली पॉलिटिक्स भी कई बार स्ट्रेस का कारण बन सकती है। इसके अलावा वेतन कम होना भी कुछ कर्मचारियों में स्ट्रेस का कारण बन सकता है। इन सभी बिंदुओं पर कर्मचारियों के हित में तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है। ज्यादातर कर्मचारियों को लगता है कि अपनी कोई समस्या उठाने पर उन्हें गलत ढंग से ‘जज’ किया जा सकता है।
खासकर अपने देश की बात की जाए तो ज्यादातर कर्मचारियों को लगता है कि अपनी कोई समस्या उठाने पर उन्हें गलत ढंग से ‘जज’ किया जाएगा। इसके पीछे यह तथ्य भी है कि आम तौर पर सीनियर्स या बॉस कर्मचारियों से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे समस्या लेकर आने के बजाय उनके सामने सॉल्यूशन पेश करेंगे। स्वाभाविक ही है, अपनी समस्या में उलझा कर्मचारी सहजता के साथ बॉस को अपनी हालत नहीं बता पाता। उसे गलत आंके जाने का डर रहता है। वर्कप्लेस पर कई बार कर्मचारियों से बुरा व्यवहार किया जाता है। उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरे कर्मचारियों से तुलना कर उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास होता है। इनसे पॉजिटिव नतीजे मिलना मुश्किल है। इसके बदले बातचीत के जरिए गुणवत्ता में सुधार की तरफ ध्यान देना ज्यादा कारगर हो सकता है।
सहज और सम्मानजनक बातचीत से कर्मचारी और मालिक के बीच एक जुड़ाव बनता है। इससे कर्मचारियों को प्रोत्साहन मिलता है। वर्कप्लेस पर ऐसा माहौल तैयार करने की जरूरत है, जिसमें कर्मचारी बिना किसी अंदेशे के अपने विचार साझा कर सकें। ऐसा माहौल सबके लिए फायदेमंद होता है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें सहज माहौल में बातचीत के जरिए दफ्तरों के अंदर के कई जटिल मसले आसानी से हल कर लिए गए। काम करने में आजादी महसूस करना भी पॉजिटिव माहौल के लिए आवश्यक होता है। जब कोई कर्मचारी स्वतंत्र रूप से काम करता है, तो वह अपना पूरा प्रयास लगाता है। ऐसे में उसका प्रदर्शन तो अच्छा होता ही है, मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी इसके फायदे मिलते हैं। ऐसा सिस्टम विकसित करने की जरूरत है कि कर्मचारियों में किसी प्रकार का तनाव न हो। वे खुद को दबाव में न महसूस करें। जब कोई व्यक्ति मानसिक रूप से आश्वस्त रहता है, तो उसमें अपमान या शर्म महसूस करने जैसी बात नहीं होती। वर्कप्लेस में ऐसा माहौल बनाने के लिए प्रबंधकों और टॉप लीडर्स को विशेष प्रयास करने चाहिएं। चुनी हुई सरकारें यदि कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य की तुरंत सुध लें तो यह सोने पर सुहागा होगा।
डा. वरिंद्र भाटिया
कालेज प्रिंसीपल
Tags:    

Similar News