बढ़ती जनसंख्या के साथ समस्याएं- खराब होता पर्यावरण, बेरोजगारी, महंगाई
बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ देश में और भी बहुत सारी समस्याएं हैं, जिनमें खराब होता पर्यावरण, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचती बेरोजगारी, महंगाई आदि शामिल हैं। अगर देश में शुद्ध पानी की बात करें तो आजादी के 74 साल बीत जाने के बाद भी 75 प्रतिशत भारतीय परिवारों को पेयजल आर्पूित सुनिश्चित नहीं है। पानी की गुणवत्ता के मामले में गुणवत्ता सूचकांक पर हम 122 देशों की सूची में 119वें स्थान पर हैं यानी भारत खराब पानी पीने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है। शुद्ध हवा के मामले में भी एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में 22 भारतीय शहर शामिल हैं। दुनिया के तमाम देशों की राजधानियों में दिल्ली सबसे प्रदूषित राजधानी के रूप में कुख्यात हो चली है। प्रदूषण के कारण दुनिया में मरने वाले 28 प्रतिशत लोग भारतीय हैं। वर्तमान में अगर कैंसर, टीबी, हाइपरटेंशन, डायबिटीज जैसी तमाम बीमारियों के सबसे ज्यादा मरीज दुनिया में कहीं पर हैं तो अपने देश में ही हैं।
देश में समस्याओं का प्रमुख कारण बढ़ती जनसंख्या का प्रकोप
देश मे मौजूद समस्याओं के बहुत से कारण हो सकते हैं, परंतु सभी समस्याओं का सबसे प्रमुख और बुनियादी कारण हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या का प्रकोप भी है। क्या यह अजीब नहीं कि 45 साल पहले 1975 में जब भारत की आबादी 55 से 56 करोड़ थी, तब देश की बढ़ती जनसंख्या इस देश के प्रमुख नेताओं के लिए एक गंभीर मुद्दा था, लेकिन 1975-77 के बाद सभी राजनीतिक दलों ने इतने गंभीर मुद्दे से किनारा कर लिया। कितना आश्चर्यजनक है कि आजादी के 74 साल बीत जाने के बाद कोई भी राजनीतिक दल बढ़ती जनसंख्या जैसे मुद्दे को आज तक अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल नहीं कर सका है। यह ठीक है कि आपातकाल में नसबंदी को लेकर जैसी जोर-जबरदस्ती की गई, उससे नेताओं ने जनसंख्या नियंत्रण पर बात करनी बंद कर दी, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं था कि यह बात नए सिरे से न शुरू की जाती। यदि बीते कुछ दशकों में बढ़ती जनसंख्या की अनदेखी नहीं की गई होती तो शायद आज जो गंभीर स्थिति है, उससे बचा जा सकता था। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि धीरे-धीरे भारत की जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार थम रही है, लेकिन इसके बावजूद तथ्य यही है कि भारत जल्द ही चीन को पछाड़कर सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने की राह पर है। कम क्षेत्रफल और सीमित संसाधनों के बीच भारत का जनसंख्या के मामले में पहले नंबर पर आना कोई अच्छी बात नहीं होगी। विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) के अवसर पर आबादी के मुद्दे पर गंभीर चर्चा होना आवश्यक है।
45 साल बाद जनसंख्या के मुद्दे पर सरकारें जागीं
यह एक शुभ संकेत है कि करीब 45 साल बाद जनसंख्या के मुद्दे पर सरकारें जगती नजर आ रही हैं। वर्ष 2019 में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से छोटे परिवार को देश प्रेम कहने के बाद अब असम और उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू होने के संकेत मिल रहे हैं। उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण के कानून का मसौदा बनाना शुरू कर दिया है। वह जल्द ही जनसंख्या को लेकर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप सकता है। यदि उत्तर प्रदेश में यह कानून आता है तो दो से अधिक बच्चों के माता-पिता को आने वाले समय में सरकारी सुविधाओं और सब्सिडी से वंचित रहना पड़ सकता है। जो भी हो, यह सही समय है कि सभी राज्य सरकारें आम जनता को बड़े परिवार से होने वाले नुकसान से परिचित कराएं। उन लोगों तक यह संदेश खासतौर पर पहुंचाया जाना चाहिए, जो परिवार नियोजन की महत्ता से परिचित नहीं हैं या फिर उसके प्रति बेपरवाह हैं। यही सही है कि आबादी का एक वर्ग छोटे परिवार की महत्ता से अवगत हो गया है, लेकिन अशिक्षित और गरीब तबके में तमाम लोग ऐसे हैं जो बड़े परिवार से होने वाले नुकसान से परिचित नहीं। जनसंख्या नियंत्रण के मामले में अब आवश्यकता यह है कि सभी राजनीतिक दल जाति, मजहब और संप्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में राज्यों के साथ-साथ केंद्रीय स्तर पर भी जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने में मदद करें, ताकि देश की जनता को प्रदूषण, खराब सेहत, बेरोजगारी, अशिक्षा और अन्य समस्याओं से छुटकारा मिल सके।