हालांकि, जब भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर संघर्ष-विराम की स्थिति है, तब ड्रोन का इस्तेमाल तनाव को जान-बूझकर बढ़ाए रखने की साजिश के अलावा और कुछ नहीं। क्या संघर्ष-विराम इसीलिए किया गया है, ताकि सीमा के आर-पार ड्रोन का इस्तेमाल आसानी से किया जा सके? जिस तरह से जम्मू में ड्रोन की मदद से हमला हुआ, जिसमें दो वायु सेना कर्मी घायल हुए, क्या उसे हल्के में उड़ा देना चाहिए? क्या यह संघर्ष-विराम तोड़ने की कोशिश नहीं है? क्या पाकिस्तान हमारे धैर्य की नई परीक्षा नहीं ले रहा है? ड्रोन से हो रहे हमले और जासूसी ने हमें नए सिरे से सोचने पर विवश कर दिया है। ड्रोन अटैक को लेकर खुद आर्मी चीफ एम एम नरवणे ने चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि ड्रोन का खुलेआम और आसानी से मिलना चिंता का विषय है। हमारी तैयारी चल रही है, पर इसके लिहाज से और सतर्क होने की जरूरत है। क्या ड्रोन के इस्तेमाल से हमारे सैन्य खर्च में बढ़ोतरी नहीं होगी? हम जगह-जगह चौकसी बढ़ाएंगे और ऐसा हो भी रहा है। अनेक सैन्य ठिकानों पर ड्रोन देखे गए हैं, ड्रोन से हमले की आशंका देखते हुए सभी सैन्य ठिकानों पर अलर्ट जारी कर दिया गया है। इसके अलावा, जम्मू में एंटी ड्रोन सिस्टम से लेकर अन्य तमाम तकनीकी व्यवस्थाएं कर दी गई हैं, ताकि किसी भी संदिग्ध ड्रोन को मार गिराया जा सके। अत: यह आशंका निर्मूल नहीं है कि पाकिस्तान हमें परेशान करने और हमारे सैन्य खर्च को बढ़ाने की दृष्टि से ही ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है। सीमा पर सैनिकों का जमावड़ा बढ़ाकर चीन की भी ऐसी ही साजिश रही है। अत: उचित मंच पर भारत को अपनी बात गंभीरता से रखनी चाहिए।
ऐसा पहली बार है, जब पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग में ड्रोन देखा गया। यह कूटनीतिक सभ्यता के विरुद्ध है। बताते हैं, उच्चायोग परिसर में जब ड्रोन देखा गया, तब वहां एक कार्यक्रम चल रहा था। यदि भारत में भी पाकिस्तानी दूतावास की ड्रोन से निगरानी की जाए, तो सीमा पार कैसा एहसास होगा? कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार की एक गरिमा होती है, जिसे बनाए रखने से राष्ट्र का सम्मान बढ़ता है, लेकिन ड्रोन से जासूसी और हमले से किसी देश का सम्मान कतई नहीं बढ़ेगा। बेशक, ये ड्रोन अगर उड़ते रहे, तो दुश्मनी की दरारों को और बढ़ाएंगे।