कई राज्यों में वोटर लिस्ट में सुधार की चल रही प्रक्रिया में सबसे बड़ी समस्या यह है कि सबूत देने की ज़िम्मेदारी वोटरों पर डाली जा रही है। अधिकारी बिना किसी खास आधार के लोगों को नोटिस भेजकर उनसे अतिरिक्त दस्तावेज़ मांग रहे हैं ताकि वे साबित कर सकें कि वे असली वोटर हैं। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद, जिसने इस प्रक्रिया को आसान बनाने और आम नागरिकों को मुश्किल प्रक्रियाओं से राहत देने की कोशिश की थी, वोटर लिस्ट का 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) विवादों में घिरा हुआ है। देश के कुछ जाने-माने नागरिकों को भी उनके वोटर रिकॉर्ड में गड़बड़ियों के कारण नोटिस मिले हैं। इस लिस्ट को देखकर कोई भी हैरान रह जाएगा। इसमें पूर्व उप-प्रधानमंत्री एल.के. आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल शामिल हैं। अजीब बात यह है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चलाई जा रही इस प्रक्रिया के तहत चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू को भी नोटिस भेजा गया है।
अगर बड़े-बड़े लोगों के साथ ऐसा हो रहा है, तो आम लोगों की मुश्किलों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, जिनके वोटर लिस्ट से हटाए जाने का खतरा है। संविधान के तहत वोटर लिस्ट में सुधार की ज़रूरत पर कोई दो राय नहीं हो सकती, लेकिन जिस तरह से चुनाव आयोग (EC) यह प्रक्रिया चला रहा है, उससे चिंताएं पैदा हुई हैं। चुनाव आयोग को ज़्यादा लचीला तरीका अपनाना चाहिए ताकि सभी योग्य वोटर अपने वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकें। ऐसी वाजिब चिंताएं हैं कि बेमतलब की प्रक्रियाओं और लगातार बढ़ते अतिरिक्त दस्तावेज़ों की मांग से बड़ी संख्या में लोग वोट देने के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
प्रवासी मज़दूर, महिलाएं और गरीब जैसे हाशिए पर रहने वाले लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे। यह लोकतंत्र के उस मकसद के खिलाफ है, जिसका मकसद रुकावटें पैदा करने के बजाय लोगों की पहुंच आसान बनाना है। लोगों का भरोसा बढ़ाने के बजाय, चुनाव आयोग की जल्दबाज़ी वाली मुहिम ने लोगों में उलझन पैदा कर दी है। अकेले दिल्ली में 33 लाख से ज़्यादा नोटिस भेजे गए हैं, खासकर उन मामलों में जहां वोटरों का मिलान 2002 के गहन सुधार (इंटेंसिव रिविज़न) से नहीं हो पाया। ECI और दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी ने ज़ोर देकर कहा है कि नोटिस मिलने का मतलब वोट काटना नहीं है। वोटरों को दस्तावेज़ जमा करने और जवाब देने का मौका दिया जा रहा है, और अंतिम फैसला उचित प्रक्रिया के तहत लिया जाएगा। वोटर लिस्ट को समय-समय पर अपडेट किया जाना चाहिए ताकि डुप्लीकेट, अयोग्य या मृत वोटरों के नाम हटाए जा सकें और साथ ही यह भी पक्का किया जा सके कि योग्य नागरिक लिस्ट से बाहर न रहें। दोनों मकसद समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, दिवंगत अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय का नाम — उनके निधन के लगभग दो साल बाद — उन लोगों की सूची में आना, जिनका डेटा 'आखिरी SIR' से मेल नहीं खाता था, यह दिखाता है कि डेटाबेस-आधारित प्रक्रियाओं में कितनी बड़ी गड़बड़ियां हो सकती हैं। नोटिस मिलने पर, मतदाताओं को संबंधित अधिकारियों के पास अपना जवाब और ज़रूरी दस्तावेज़ जमा करने होते हैं। यह पक्का किया जाना चाहिए कि हर योग्य मतदाता को वोटर लिस्ट में बने रहने का उचित मौका मिले। इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए एक पारदर्शी और समीक्षा-योग्य प्रक्रिया की ज़रूरत है।