भारत में मुनाफ़ा कमाने वाली दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच का अनैतिक गठजोड़ अक्सर मरीज़ों के नुकसान का कारण बनता है। जेनेरिक दवाओं के बजाय महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखना और गैर-ज़रूरी जांच करवाना कुछ ऐसी हरकतें हैं जो मरीज़ों के अपने विकल्प चुनने के अधिकार को कमज़ोर करती हैं। जब दवा लिखने के फैसले पर लालच का असर होता है, तो इसका नतीजा मरीज़ों और हेल्थकेयर की लागत पर पड़ता है। हालांकि फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिस के लिए यूनिफॉर्म कोड (UCPMP) 2014 से लागू है और 2024 में इसमें बदलाव भी किए गए हैं, लेकिन इसे लागू करने का तरीका कमज़ोर रहा है और इसे लॉजिस्टिकल, स्ट्रक्चरल और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इस माहौल में, अनैतिक फार्मा मार्केटिंग को रोकने के लिए एक्सपर्ट कमेटी बनाने का सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्देश एक स्वागत योग्य कदम है। उम्मीद है कि कोर्ट का यह दखल रेगुलेटरी कमी को दूर करने में बड़ी भूमिका निभाएगा। UCPMP के खिलाफ मुख्य आलोचना यह है कि इसे लागू करने वाली संस्था फार्मा एसोसिएशन के स्तर पर बनाई गई थी।
चूंकि इंडस्ट्री के ही लोगों को अपने सदस्यों के खिलाफ शिकायतों की जांच का काम सौंपा गया था, इसलिए हितों का टकराव (conflict of interest) पैदा हुआ, जिससे निष्पक्ष तरीके से इसे लागू करने में बाधा आई। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि फार्मा कंपनियां खास दवाओं को बढ़ावा देने के लिए डॉक्टरों को महंगे तोहफे, विदेश यात्राएं और अन्य फायदे देती हैं। ऐसी हरकतें क्लिनिकल फैसले को प्रभावित कर सकती हैं और ज़रूरत से ज़्यादा दवाएं लिखने को बढ़ावा दे सकती हैं। इसके अलावा, मरीज़ आमतौर पर यह नहीं समझ पाते कि कोई दवा ज़रूरी है या नहीं, या उसका कोई सस्ता विकल्प मौजूद है या नहीं। UCPMP गाइडलाइंस डॉक्टरों को तोहफे, यात्रा की सुविधा, मेहमाननवाज़ी और पैसे देने पर रोक लगाती हैं और शिकायतों के समाधान के लिए एथिक्स कमेटी, खर्च की जानकारी देने और एक शीर्ष पैनल जैसे तरीके बताती हैं।
अब तक का अनुभव बताता है कि स्वेच्छा से नियमों का पालन काफी नहीं हो सकता। शीर्ष पैनल को बहुत कम शिकायतें मिली हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि अनैतिक हरकतें कम होती हैं। इसके पीछे दूसरी वजहें भी हो सकती हैं, जैसे शिकायतों की कम रिपोर्टिंग, कमज़ोर तरीके से लागू करना या ताकतवर कमर्शियल लॉबी का सामना करने से हिचकिचाहट।
पहले 'ज़रूरी चीज़ों के कानून' (Essential Commodities Act) या 'दवा और कॉस्मेटिक कानून' (Drugs and Cosmetics Act) के ज़रिए कानूनी मान्यता देने की कोशिशों पर अधिकार क्षेत्र और कानूनी वैधता को लेकर सवाल उठे थे। प्रस्तावित कमेटी को नौकरशाही की वजह से होने वाली देरी से बचना चाहिए।
उसे अंतरराष्ट्रीय मॉडल, हितों के टकराव, जानकारी देने की ज़रूरतों, सज़ा, स्वतंत्र जांच और मेडिकल रेगुलेटर की भूमिका की जांच करनी चाहिए। सरकार को एक साफ़ कानूनी रोडमैप तैयार करना चाहिए, जिसमें यह भी शामिल हो कि क्या कोई नया कानून ज़रूरी है। मरीज़ों को पेशेवर सलाह के नाम पर चलाए जाने वाले मार्केटिंग कैंपेन का छिपा हुआ खर्च नहीं उठाना चाहिए।
हालाँकि UCPMP 2024 को अनिवार्य बताया गया है, लेकिन यह संसद के किसी स्वतंत्र कानून के बजाय प्रशासनिक निर्देशों के तहत काम करता है। किसी आपराधिक कानून का औपचारिक समर्थन न होने के कारण, इसमें सज़ा मुख्य रूप से साथियों के स्तर पर की जाने वाली कार्रवाई तक ही सीमित रहती है, न कि ऐसी कार्रवाई तक जिसे लागू कराया जा सके। कानूनी मज़बूती की इसी कमी के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अब दखल दिया है और सरकार को स्पष्ट कानूनी सिफ़ारिशें तैयार करने का निर्देश दिया है। हेल्थकेयर एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ मरीज़ों के हितों की रक्षा के लिए सरकारी नियमन ज़रूरी है।