बहिष्कार ‘एहसान फरामोश’

Update: 2025-05-16 12:06 GMT
By: divyahimachal : तुर्किये ‘एहसान फरामोशी’ का सबसे बदनाम उदाहरण हो सकता है। जब फरवरी, 2023 में तुर्किये में 7.8 तीव्रता का भूकंप आया था, करीब 40,000 लोग मारे गए थे, इमारतें ‘मिट्टी-मलबा’ हो गई थीं, तब भारत ने मदद का पहला हाथ बढ़ाया था। भारत ने उसे मानवीय दायित्व समझा और पूरा अभियान चलाया। हमारे एनडीआरएफ के जवानों ने दबी हुई जिंदगियों को प्राण देने की कोशिश की, डॉक्टरों ने कई कमाल किए और भारत ने तुर्की अवाम के लिए भोजन-पानी के बंदोबस्त किए। बेशक तुर्किये एहसान न माने, लेकिन वह ‘एहसान फरामोश’ क्यों हुआ? भारत-पाक के हालिया सैन्य संघर्ष के दौरान उसने पाकिस्तान का साथ दिया, 350 से अधिक ड्रोन सप्लाई किए, समुद्री जहाज तक भेजा और सैनिक भी उस संघर्ष का हिस्सा बने। चूंकि सैन्य कार्रवाई के दौरान तुर्किये के 2 ‘ड्रोन ऑपरेटर’ मारे गए, लिहाजा तुर्की सैनिकों की मौजूदगी की पुष्टि होती है। तुर्किये ने पाकिस्तान के समर्थन में बयान भी दिए। आखिर तुर्किये भारत-विरोधी क्यों हुआ? बहरहाल भारत की राष्ट्रीय प्रतिक्रिया यह सामने आई है कि टूर-टै्रवल कंपनियों, औद्योगिक संगठनों, विश्वविद्यालय और सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने तुर्किये पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी है। करीब 250 फीसदी टूर और बुकिंग रद्द करवा दी गई हैं। तुर्किये और अजरबैजान जाने वाले पर्यटकों की बुकिंग में 60 फीसदी गिरावट आई है। यह सिलसिला अभी जारी है। टै्रवल कारोबार से जुड़ी कंपनियों का आकलन है कि करीब 5000 करोड़ रुपए का नुकसान तुर्किये को होगा। 2024 में 3.30 लाख से अधिक भारतीय पर्यटक तुर्किये गए थे और करीब 2.43 लाख सैलानी अजरबैजान घूमने गए थे। छोटी और सीमित अर्थव्यवस्थाओं के लिए पर्यटकों की ये संख्या कम नहीं है। सेब, संगमरमर और अन्य सामान आयात करना व्यापारियों ने खुद ही बंद कर दिया है। 2023-24 में तुर्किये को हमने 3885 वस्तुओं का निर्यात किया और 2482 वस्तुओं का आयात भी किया, लेकिन अब बहिष्कार करने और पाबंदी लगाने की मांगें हुंकारों की तरह बुलंद हैं। 2023-24 में भारत ने तुर्किये से करीब 821 करोड़ रुपए के सेब खरीदे थे। राजस्थान और महाराष्ट्र में सबसे अधिक संगमरमर, करीब 14 लाख टन, तुर्किये से ही आयात किया जाता है।
भारत और तुर्किये के बीच वित्त वर्ष 2024 में द्विपक्षीय व्यापार 10.4 अरब डॉलर का हुआ था। 2000-24 के दौरान तुर्किये ने 240.18 मिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत में किया है। गौरतलब यह है कि तुर्किये की कंपनी ‘सेलेबी’ भारत के 9 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर ग्राउंड हैंडलिंग का काम कर रही हैं। यह बेहद संवेदनशील व्यवस्था है। क्या भारत सरकार उनकी सेवाएं निलंबित करने पर विचार करेगी? दरअसल भारतीय पर्यटकों ने तुर्किये और अजरबैजान की अर्थव्यवस्था को हजारों करोड़ रुपए दिए। वहां नौकरियां बढ़ीं, होटल और विमानन क्षेत्र का विस्तार हुआ, भारत में कई परियोजनाओं के अनुबंध तय किए गए, तो तुर्किये की अर्थव्यवस्था ही बढ़ी। अब ‘एहसान फरामोश’ को दंडित करना ही चाहिए। भारत सरकार स्पष्ट करे कि वह देश के गुस्से और आक्रोश को कितना समर्थन दे रही है? वैसे तो चीन, तुर्किये, अजरबैजान ने भारत-पाक संघर्ष के दौरान दुश्मन का ही समर्थन किया और उसे सैन्य सहयोग भी दिया। भारत ने चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ और सरकारी न्यूज एजेंसी ‘शिन्हुआ’ के ‘एक्स’ अकाउंट को ब्लॉक कर दिया है। तुर्किये की सरकारी प्रसारक कंपनी ‘टीआरटी वल्र्ड’ को भी बंद कर दिया गया है। चीन पर इससे अधिक पाबंदियां नहीं लगाई जा सकतीं, क्योंकि उसके साथ व्यापार का आंकड़ा सर्वाधिक है। चीन के एयर डिफेंस सिस्टम को भारतीय वायुसेना ने 23 मिनट के लिए बिल्कुल जाम कर दिया था। उसी दौरान भारत ने अपना सैन्य मिशन पूरा किया। चीन की हथियारबंद मौजूदगी का इससे प्रामाणिक सबूत और क्या हो सकता है? बहरहाल तुर्किये ने इस्लामी देशों का ‘खलीफा’ बनने का मुगालता पाल रखा है, लिहाजा उसकी हेकड़ी तोडऩा बहुत जरूरी है। भारत बहिष्कार या अन्य सख्त विकल्प पर विचार करे। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, अफगानिस्तान, कतर सरीखे प्रमुख इस्लामी देशों ने ‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई’ में भारत का समर्थन किया है। तुर्किये को उसके ‘गिरगिटी रंग’ के लिए सजा जरूर दी जानी चाहिए।
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