नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति से जुड़े मामले में मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इंडियन यूथ कांग्रेस की ओर से दाखिल याचिका का केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की तरफ से विरोध किया गया। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने दलील दी कि जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया जा चुका है। ऐसे में वहां प्रदर्शन करने की अनुमति से संबंधित याचिका अब अप्रासंगिक हो गई है। हालांकि, अदालत ने पुलिस की आपत्तियों के बावजूद याचिका की तीन मांगों पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अमित महाजन की अदालत में मामले की सुनवाई हुई। याचिका इंडियन यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब ने दाखिल की है। इसमें दिल्ली पुलिस द्वारा विरोध प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किए जाने को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और प्रशासन बिना उचित कारण तथा परिस्थितियों का व्यक्तिगत आकलन किए इस अधिकार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर विवाद
इंडियन यूथ कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली पुलिस से अनुमति मांगी थी।संगठन ने 25 सितंबर 2026 को पुलिस के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें लगभग 100 से 150 लोगों के शामिल होने की जानकारी दी गई थी।यूथ कांग्रेस ने भरोसा दिलाया था कि प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा, यातायात व्यवस्था, सार्वजनिक अनुशासन और कानून-व्यवस्था से संबंधित सभी आवश्यक शर्तों का पालन किया जाएगा।
हालांकि, संगठन का आरोप है कि पुलिस ने आवेदन पर समय रहते निर्णय नहीं लिया। बार-बार संपर्क करने के बाद भी अनुमति से संबंधित फैसला एक अक्टूबर को बताया गया, जबकि उसी दिन से प्रदर्शन प्रस्तावित था।इसके बाद यूथ कांग्रेस ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
केंद्र सरकार ने याचिका का किया विरोध
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा अदालत में पेश हुए।उन्होंने कहा कि पूरी याचिका मूल रूप से जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति से संबंधित है।शर्मा ने दलील दी कि जंतर-मंतर को अब अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। इसलिए उस स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के खिलाफ दायर याचिका का मूल उद्देश्य समाप्त हो चुका है।उन्होंने अदालत से याचिका पर नोटिस जारी नहीं करने का अनुरोध किया।हालांकि, यूथ कांग्रेस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने इसका विरोध किया और कहा कि याचिका में उठाए गए अन्य कानूनी सवाल अब भी प्रासंगिक हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया हवाला
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एएसजी चेतन शर्मा ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर 2026 के आदेश का उल्लेख किया।उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों के लिए बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता पर जोर दिया था।सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे उपयुक्त स्थानों की पहचान करने पर विचार किया जाना चाहिए, जहां प्रदर्शनकारियों के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जा सकें।एएसजी ने दलील दी कि इसी आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों की पहचान की है।उन्होंने अदालत को बताया कि पुलिस ने तीन वैकल्पिक स्थान चिह्नित किए हैं और इसी प्रक्रिया के तहत जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया गया है।
जंतर-मंतर की जगह तीन वैकल्पिक स्थान
दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर के स्थान पर तीन वैकल्पिक स्थलों की पहचान की है।इनमें रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड शामिल हैं।पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की सुविधा और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इन स्थानों को चुना गया है।
दूसरी ओर, प्रदर्शन की अनुमति मांगने वाले संगठनों की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या किसी विशेष स्थान को सूची से हटाने के आधार पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति से संबंधित सभी मांगें समाप्त मानी जा सकती हैं।
यूथ कांग्रेस के वकील ने रखी अलग दलीलयूथ कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने अदालत को बताया कि याचिका में केवल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने की मांग नहीं की गई है।इसमें दिल्ली पुलिस द्वारा विरोध प्रदर्शनों के लिए लागू नियमों और अनुमति देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।याचिकाकर्ता की दलील है कि पुलिस शांतिपूर्ण सभा को नियंत्रित करने के अपने अधिकार का उपयोग उसे पूरी तरह प्रतिबंधित करने के लिए नहीं कर सकती।
संगठन ने कहा कि किसी प्रदर्शन की अनुमति पर फैसला लेते समय उसकी वास्तविक परिस्थितियों और कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों पर भी विचार होना चाहिए।हाईकोर्ट ने तीन मांगों पर जारी किया नोटिसदोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति अमित महाजन ने याचिका की तीन मांगों पर नोटिस जारी किया।इनमें दिल्ली पुलिस के वर्ष 2022 के स्थायी आदेश के इस्तेमाल को लेकर सवाल शामिल हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस किसी सामान्य आदेश के आधार पर प्रत्येक प्रदर्शन को बिना अलग-अलग परिस्थितियों की जांच किए प्रतिबंधित नहीं कर सकती।इसके अलावा प्रदर्शन की अनुमति के लिए 10 दिन पहले आवेदन करने की शर्त को भी चुनौती दी गई है।यूथ कांग्रेस का तर्क है कि 10 दिन की समयसीमा से कम अवधि में दिए गए आवेदन को केवल इसी आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।अदालत ने इन मांगों पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है।
संविधान के अधिकारों का दिया हवाला
याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(ए) और अनुच्छेद 19(1)(बी) का उल्लेख किया गया है।\अनुच्छेद 19(1)(ए) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(बी) शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के सभा करने का अधिकार देता है।हालांकि, ये अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं हैं। संविधान के तहत सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।इस मामले में अदालत के सामने महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विरोध प्रदर्शन की अनुमति से संबंधित नियमों को लागू करते समय प्रशासन को किन परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए।
17 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने यूथ कांग्रेस की याचिका पर पुलिस को जवाब देने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।अदालत ने याचिकाकर्ता को बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार अपनी याचिका में संशोधन करने के लिए भी कहा है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने प्रदर्शन की अनुमति देने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। तीन मांगों पर नोटिस जारी होने का अर्थ है कि अदालत ने उन मुद्दों पर संबंधित पक्षों का जवाब मांगा है। इसे याचिका की अंतिम स्वीकृति या पुलिस की कार्रवाई को अवैध घोषित करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।