नई दिल्ली/चेन्नई। कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। तमिलनाडु सरकार ने पानी की गंभीर कमी का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत से कर्नाटक को उसके हिस्से का कावेरी जल तत्काल उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की है। राज्य का कहना है कि मेट्टूर बांध में मौजूद पानी सीमित है और वर्तमान भंडार से केवल 25 से 30 दिनों तक ही सिंचाई की जरूरत पूरी की जा सकती है।

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल आवेदन में कहा है कि मौजूदा स्थिति बेहद गंभीर है और कावेरी डेल्टा में लाखों एकड़ कृषि भूमि नदी के पानी पर निर्भर है। राज्य ने अदालत से कर्नाटक को पूर्व के न्यायिक फैसलों और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण यानी CWMA के निर्देशों के अनुरूप आनुपातिक आधार पर पानी उपलब्ध कराने का आदेश देने की मांग की है।

तमिलनाडु ने अपनी याचिका में विशेष रूप से CWMA के 8 सितंबर के फैसले का उल्लेख किया है। इस फैसले में कर्नाटक को 9 सितंबर से 23 सितंबर तक तमिलनाडु के लिए 6,000 क्यूसेक पानी का प्रवाह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था।

राज्य सरकार का कहना है कि कावेरी जल वर्ष के दौरान उसे निर्धारित अनुपात के मुताबिक पानी नहीं मिला है। इसी वजह से सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हुई और मेट्टूर बांध से खेती के लिए पानी छोड़ने में देरी हुई।

तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट से एक जुलाई से 9 सितंबर 2026 के बीच पानी की कथित कमी को पूरा कराने का भी आग्रह किया है। आवेदन के मुताबिक बिलिगुंडुलु अंतरराज्यीय सीमा बिंदु पर आनुपातिक आधार पर 16.01 TMC पानी की कमी पूरी की जानी चाहिए।

तमिलनाडु सरकार ने अपनी याचिका में कावेरी को राज्य की जीवनरेखा बताते हुए कहा है कि लगभग 25 लाख एकड़ कृषि क्षेत्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नदी के पानी पर निर्भर है। पर्याप्त पानी नहीं मिलने का सीधा असर किसानों और कृषि उत्पादन पर पड़ने की आशंका है।

राज्य के मुताबिक इस साल कुरुवई फसल पर पानी की कमी का गंभीर प्रभाव पड़ा। सामान्य परिस्थितियों में मेट्टूर बांध से डेल्टा सिंचाई के लिए जून में पानी छोड़े जाने की परंपरा रही है, लेकिन इस बार पानी की उपलब्धता कम होने के कारण ऐसा नहीं किया जा सका।

तमिलनाडु सरकार ने आखिरकार 1 सितंबर को मेट्टूर बांध से कावेरी डेल्टा की सिंचाई और पेयजल आवश्यकताओं के लिए पानी छोड़ना शुरू किया। पानी छोड़े जाने के करीब दो सप्ताह बाद यह कावेरी डेल्टा के अंतिम हिस्सों तक पहुंचा और विभिन्न नहर प्रणालियों के जरिए सिंचाई शुरू की गई।

लेकिन तमिलनाडु की चिंता यह है कि बांध में उपलब्ध सीमित जल भंडार लंबे समय तक सिंचाई की मांग पूरी नहीं कर पाएगा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल आवेदन में राज्य ने कहा है कि मौजूदा पानी केवल लगभग 25 से 30 दिनों तक इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि इस दौरान पर्याप्त अतिरिक्त पानी नहीं मिला तो खड़ी फसलों और आगे की कृषि गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

तमिलनाडु ने यह भी कहा है कि इस साल मेट्टूर बांध जून में नहीं खोले जाने के कारण कुरुवई की खेती प्रभावित हुई और सांबा फसल के लिए भी बड़े क्षेत्र को समय पर सिंचाई के दायरे में नहीं लाया जा सका।

वहीं इस विवाद में कर्नाटक का पक्ष अलग है। कर्नाटक सरकार का कहना है कि उसके कावेरी बेसिन में भी पानी की गंभीर कमी है। राज्य ने कम बारिश, बांधों में घटते जलस्तर और पेयजल की जरूरतों का हवाला देते हुए CWMA के 6,000 क्यूसेक पानी उपलब्ध कराने के निर्देश पर आपत्ति जताई है।

कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री एन. चालुवरायस्वामी ने हाल में कहा था कि राज्य के कावेरी बेसिन में जल उपलब्धता की स्थिति चुनौतीपूर्ण है। कर्नाटक के मुताबिक उसके चार प्रमुख कावेरी बेसिन जलाशयों में 7 सितंबर तक करीब 63.218 TMC पानी था। राज्य का तर्क है कि पेयजल, पर्यावरणीय प्रवाह और अन्य जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद सिंचाई के लिए उपलब्ध मात्रा काफी कम रह जाती है।

कर्नाटक ने CWMA और कावेरी जल विनियमन समिति के निर्देश को चुनौती देने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इस तरह दोनों राज्यों ने अपने-अपने जल संकट और आवश्यकताओं को लेकर शीर्ष अदालत के सामने पक्ष रखा है।

कावेरी जल बंटवारे की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों और उसके आधार पर स्थापित संस्थागत प्रणाली के तहत संचालित होती है। वर्ष 2018 में लागू कावेरी जल प्रबंधन योजना में संकट की स्थिति में उपलब्ध पानी की कमी को संबंधित राज्यों के बीच निर्धारित व्यवस्था के तहत साझा करने का प्रावधान है।

इसी आधार पर तमिलनाडु अब ‘आनुपातिक आधार’ पर पानी की मांग कर रहा है। उसका कहना है कि यदि किसी वर्ष पानी की उपलब्धता सामान्य से कम है तो इसका भार भी संबंधित राज्यों के बीच उचित अनुपात में बांटा जाना चाहिए।

मामले का एक महत्वपूर्ण बिंदु बिलिगुंडुलु है। कर्नाटक से तमिलनाडु आने वाले कावेरी जल की मात्रा का आकलन इसी अंतरराज्यीय सीमा बिंदु पर किया जाता है। तमिलनाडु ने अपनी याचिका में 16.01 TMC की कथित कमी इसी बिंदु पर पूरी कराने की मांग की है।

तमिलनाडु ने अपनी याचिका में यह आरोप भी लगाया है कि कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट और वैधानिक जल प्रबंधन संस्थाओं के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया। कर्नाटक इन आरोपों से सहमत नहीं है और अपनी जल उपलब्धता तथा पेयजल जरूरतों का हवाला दे रहा है। इसलिए दोनों राज्यों के दावों पर अंतिम निर्णय न्यायिक और वैधानिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।

मेट्टूर बांध तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा की सिंचाई व्यवस्था का प्रमुख आधार है। तंजावुर, तिरुवरूर, नागपट्टिनम और मयिलादुथुरै सहित कई क्षेत्रों में खेती के लिए यहां से छोड़े जाने वाले पानी का विशेष महत्व है। पानी की उपलब्धता में कमी होने पर धान सहित कई फसलों की बुवाई और सिंचाई कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं।

मौजूदा विवाद ऐसे समय बढ़ा है जब कर्नाटक भी अपने कावेरी बेसिन में कमजोर मानसून और घटते जलाशय स्तर का हवाला दे रहा है। इस वजह से जल बंटवारे का सवाल दोनों राज्यों के लिए संवेदनशील बना हुआ है।

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने तमिलनाडु की मांग है कि कर्नाटक को तत्काल निर्धारित मात्रा में पानी उपलब्ध कराने और पिछले महीनों की 16.01 TMC की कथित कमी को आनुपातिक आधार पर पूरा करने का निर्देश दिया जाए। दूसरी तरफ कर्नाटक अपने यहां उपलब्ध पानी और आवश्यकताओं को आधार बनाकर राहत की मांग कर रहा है।

कावेरी जल विवाद में आगे सुप्रीम कोर्ट और CWMA के फैसले महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल तमिलनाडु के लिए सबसे बड़ी चिंता मेट्टूर बांध का सीमित जल भंडार और डेल्टा क्षेत्र की फसलों को पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध कराना है। वहीं कर्नाटक भी अपने जलाशयों की स्थिति को लेकर संकट का दावा कर रहा है। ऐसे में दोनों राज्यों की जरूरतों और मौजूदा जल उपलब्धता के आधार पर आगे की व्यवस्था तय होने की संभावना है।

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