नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने मतदाता सूची को लेकर बड़ा दावा किया है। स्वामी का कहना है कि उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए चुनाव आयोग पर दबाव डाला जा रहा है। उनके इस दावे के बाद मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर नई राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि स्वामी के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इस विशिष्ट दावे पर चुनाव आयोग का आधिकारिक जवाब सामने आना बाकी है।
सुब्रमण्यम स्वामी लंबे समय से विभिन्न राजनीतिक और सार्वजनिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते रहे हैं। अब मतदाता सूची से अपना नाम हटाए जाने की कथित कोशिश का दावा कर उन्होंने चुनावी प्रक्रिया से जुड़े संवेदनशील मुद्दे को उठाया है। स्वामी का कहना है कि चुनाव आयोग पर उनका नाम मतदाता सूची से हटाने का दबाव है।
इस दावे को इसलिए भी गंभीरता से देखा जा रहा है क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और नामों को शामिल करने या हटाने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। कई मामलों में राजनीतिक दलों और नागरिकों ने मतदाता सूची में नाम नहीं मिलने या नाम हटने पर सवाल उठाए हैं।
हालांकि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाना केवल राजनीतिक दावे के आधार पर स्वतः साबित नहीं होता। इसके लिए चुनावी कानून और निर्वाचन आयोग की निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है। आयोग के मुताबिक किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न हटे, इसके लिए बूथ लेवल ऑफिसर द्वारा सत्यापन, नोटिस, कारण दर्ज करने, दावा-आपत्ति और अपील जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करने के लिए पात्र व्यक्ति का नाम संबंधित मतदाता सूची में दर्ज होना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति के पास मतदाता पहचान पत्र मौजूद है लेकिन उसका नाम संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की मौजूदा मतदाता सूची में नहीं है, तो केवल पहचान पत्र दिखाकर मतदान नहीं किया जा सकता। इसलिए मतदाता सूची में सही जानकारी का होना बेहद महत्वपूर्ण है।
निर्वाचन आयोग समय-समय पर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करता है। इस दौरान नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं। मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, डुप्लीकेट पंजीकरण या अन्य वैधानिक कारणों से नाम हटाने की प्रक्रिया भी होती है। मतदाताओं को अपनी जानकारी में सुधार और पते में बदलाव की सुविधा भी दी जाती है।
नाम हटाने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। चुनाव आयोग की ओर से केंद्र सरकार को उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक गलत तरीके से नाम हटने से रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय हैं। इनमें मतदाता को पहले सूचना देना, BLO द्वारा घर जाकर सत्यापन की कोशिश करना और निर्धारित प्रक्रिया के बाद ही नाम हटाना शामिल है।
मतदाता सूची का ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद नागरिकों को दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर भी दिया जाता है। इसके लिए अलग-अलग निर्धारित फॉर्म मौजूद हैं। पात्र मतदाता अपने नाम को शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है, जबकि किसी प्रविष्टि पर आपत्ति के लिए भी कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध है।
अगर किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हट जाता है तो उसके पास फैसले को चुनौती देने का रास्ता भी होता है। निर्धारित अपीलीय प्राधिकारी के सामने अपील की जा सकती है। यही वजह है कि किसी नाम को हटाने के आरोप और वास्तव में निर्वाचन सूची से नाम हटाए जाने के बीच अंतर करना जरूरी है।
स्वामी के मामले में भी सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही होगा कि क्या उनके नाम को हटाने के लिए कोई औपचारिक आवेदन या प्रक्रिया शुरू हुई है। यदि हुई है तो उसका आधार क्या है और संबंधित निर्वाचन अधिकारी ने उस पर क्या कार्रवाई की है। इन जानकारियों के बिना केवल दबाव डाले जाने के आरोप के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि चुनाव आयोग उनका नाम हटाने जा रहा है।
मतदाता सूचियों को लेकर विवाद का मुद्दा हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में भी प्रमुखता से सामने आया है। वहां SIR के बाद नामों को शामिल करने और हटाने से संबंधित लाखों अपीलों का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में अपीलें अभी लंबित हैं। इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची संबंधी शिकायतों और अपीलों के निपटारे की निगरानी की जा रही है।
मतदाता सूची को लेकर चुनाव आयोग का कहना रहा है कि उसका उद्देश्य सूची को सही और अपडेट रखना है। वहीं विभिन्न विपक्षी दल समय-समय पर पुनरीक्षण प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम हटने का आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे आरोप राजनीतिक विवाद का हिस्सा हैं और प्रत्येक मामले की पुष्टि संबंधित निर्वाचन रिकॉर्ड तथा कानूनी प्रक्रिया से अलग-अलग करनी होती है।
सुब्रमण्यम स्वामी का राजनीतिक सफर लंबा रहा है। वह जनता पार्टी से लेकर भाजपा तक विभिन्न राजनीतिक मंचों से जुड़े रहे हैं। वह राज्यसभा सदस्य और केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। भाजपा से जुड़े रहने के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में वह अपनी ही पार्टी और केंद्र सरकार की कई नीतियों तथा फैसलों की सार्वजनिक आलोचना करते रहे हैं।
इसी कारण उनका नया दावा राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। उनके समर्थक इस मामले में निर्वाचन आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर सकते हैं, जबकि आयोग का आधिकारिक पक्ष आने के बाद ही यह पता चलेगा कि उनके नाम से संबंधित मतदाता सूची में वास्तव में कोई कार्रवाई चल रही है या नहीं।
मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के मामलों में निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि स्वामी को किसी तरह का नोटिस मिला है या उनके नाम पर आपत्ति दर्ज हुई है तो संबंधित दस्तावेजों से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। इसी तरह अगर ऐसी कोई प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई है तो उनके आरोप का आधार क्या है, यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा।
कानूनी व्यवस्था में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर और गलत फैसले की स्थिति में अपील का विकल्प मिलता है। इस वजह से राजनीतिक दबाव के आरोप और वास्तविक प्रशासनिक कार्रवाई को अलग-अलग देखना जरूरी है।
फिलहाल सुब्रमण्यम स्वामी का यह कहना कि उनका नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए चुनाव आयोग पर दबाव डाला जा रहा है, उनका दावा है। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। चुनाव आयोग या संबंधित मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से इस विशिष्ट मामले में आधिकारिक स्पष्टीकरण मिलने पर ही स्थिति पूरी तरह साफ हो सकेगी।
मतदाता सूची से जुड़ा मामला सीधे नागरिक के मतदान अधिकार से संबंधित है। ऐसे में किसी भी दावे की पुष्टि आधिकारिक निर्वाचन रिकॉर्ड से होना जरूरी है। स्वामी के आरोप के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि चुनाव आयोग इस पर कोई प्रतिक्रिया देता है या नहीं और उनके मतदाता पंजीकरण को लेकर वास्तव में किसी तरह की प्रक्रिया चल रही है या नहीं।