संसद सुरक्षा समीक्षा पर दिल्ली HC में PIL

Update: 2026-07-28 14:29 GMT

New Delhi : दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इसमें केंद्र सरकार और लोकसभा व राज्यसभा सचिवालयों से संसद की सुरक्षा और संरक्षा से जुड़े मौजूदा संस्थागत ढांचे की व्यापक समीक्षा करने का निर्देश देने की मांग की गई है, ताकि बदलती सुरक्षा चुनौतियों का सामना किया जा सके।

यह याचिका राज सिंह ने भारत संघ, गृह मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय, लोकसभा सचिवालय और राज्यसभा सचिवालय के खिलाफ दायर की है।

याचिका में कहा गया है कि इसमें कोई नया कानून बनाने का निर्देश नहीं मांगा गया है, बल्कि अधिकारियों से याचिकाकर्ता द्वारा तैयार किए गए एक कॉन्सेप्ट नोट की जांच करने को कहा गया है। इस नोट का शीर्षक "प्रस्तावित रूपरेखा: भारत की संसद (सुरक्षा, पवित्रता और संरक्षण) अधिनियम, 2026" है। साथ ही, इस पर सोच-समझकर फैसला लेने को कहा गया है कि क्या किसी सुधार की आवश्यकता है।

याचिकाकर्ता ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की भी मांग की है कि वे कोर्ट द्वारा तय समय-सीमा के भीतर समीक्षा प्रक्रिया पूरी करें और उचित निर्णय या स्टेटस रिपोर्ट के माध्यम से परिणाम कोर्ट के सामने रखें।

याचिका के अनुसार, संसद केवल एक भौतिक इमारत नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक संस्था है। प्रतिनिधि लोकतंत्र, कार्यपालिका की जवाबदेही और संवैधानिक शासन के लिए इसका निर्बाध कामकाज आवश्यक है।

इसमें तर्क दिया गया है कि समय के साथ विधायिकाओं के लिए खतरों का स्वरूप काफी बदल गया है। अब पारंपरिक भौतिक हमलों के अलावा साइबर हमले, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी गलत सूचनाएं, ड्रोन तकनीक, अंदरूनी खतरे और सुनियोजित डिजिटल हस्तक्षेप जैसे खतरे भी शामिल हैं।

याचिका में संसद पर 2001 के आतंकवादी हमले और 2023 में लोकसभा के अंदर सुरक्षा में सेंध का जिक्र किया गया है। इसमें तर्क दिया गया है कि ये घटनाएं संसद के सुरक्षा ढांचे के समय-समय पर मूल्यांकन और आधुनिकीकरण की आवश्यकता को दर्शाती हैं।

इसमें हाल ही में हुए "संसद चलो" मार्च के आह्वान का भी हवाला दिया गया है। कहा गया है कि हालांकि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन संवैधानिक रूप से संरक्षित हैं, लेकिन अधिकारियों को ऐसा संस्थागत ढांचा सुनिश्चित करना चाहिए जो लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और संसद की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखे।

याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा कानूनी और संस्थागत ढांचे तथा अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीकों का अध्ययन करने के बाद, उन्होंने संसद की सुरक्षा को मजबूत करने के उपायों का प्रस्ताव देने वाला एक कॉन्सेप्ट नोट तैयार किया।

हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह दस्तावेज केवल एक नीतिगत प्रस्ताव है और कोर्ट से संसद को कोई कानून बनाने या कोई विशिष्ट नीति अपनाने का निर्देश देने के लिए नहीं कहा जा रहा है। इसके बजाय, अनुरोध केवल सक्षम अधिकारियों से प्रस्ताव पर विचार करने और कानून के अनुसार तर्कसंगत निर्णय लेने तक सीमित है। याचिका में अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी जैसे देशों में हुए घटनाक्रमों का भी हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सुरक्षा से जुड़ी बड़ी घटनाओं के बाद कई लोकतांत्रिक देशों ने अपनी संसदीय सुरक्षा की समीक्षा की है और उसे मज़बूत बनाया है। इसमें तर्क दिया गया है कि भारत को भी देश की सर्वोच्च विधायी संस्था के सामने मौजूद और भविष्य के खतरों से निपटने के लिए इसी तरह व्यापक समीक्षा करनी चाहिए।

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