देश की शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खाली शिक्षक पदों को लेकर सरकार से जवाब तलब
नई दिल्ली। देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने देशभर में शिक्षकों के खाली पदों को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने दावा किया कि देश में करीब 10 लाख शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं और इस मामले पर सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को जवाब देना होगा।
आशुतोष रांका ने कहा कि सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, मूलभूत सुविधाओं की कमी है और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने में बड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा किसी भी देश की नींव होती है, लेकिन अगर स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चों के भविष्य पर सीधा असर पड़ेगा। रांका ने मांग की कि सरकार को खाली पड़े शिक्षक पदों को जल्द से जल्द भरने के लिए ठोस योजना बनानी चाहिए।
शिक्षा मंत्रियों को देना होगा जवाब'
आशुतोष रांका ने कहा कि देश के सभी शिक्षा मंत्रियों से यह पूछा जाना चाहिए कि उनके राज्यों में कितने शिक्षक पद खाली हैं और उन्हें भरने के लिए क्या योजना तैयार की गई है। उन्होंने कहा कि केवल घोषणाओं से शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधरेगी, बल्कि जमीन पर काम करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि हर राज्य सरकार को अपने सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने रखनी चाहिए। स्कूलों में शिक्षकों की कमी, भवनों की स्थिति, शौचालय, पेयजल और अन्य सुविधाओं को लेकर भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सरकारी स्कूलों की स्थिति पर उठाए सवाल
रांका ने 'स्कूल ठीक करो' अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि अभियान के दौरान सरकारी स्कूलों की कई कमियां सामने आई हैं। उन्होंने दावा किया कि कई जगहों पर स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और छात्रों को पढ़ाई के लिए जरूरी माहौल नहीं मिल पा रहा है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सिर्फ बजट बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि उसकी सही निगरानी और उपयोग भी जरूरी है। शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और स्कूलों में संसाधनों की उपलब्धता पर लगातार ध्यान देना होगा।
सरकार पर लगाया लापरवाही का आरोप
आशुतोष रांका ने आरोप लगाया कि सरकारें शिक्षा के क्षेत्र में बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि अगर लाखों पद खाली हैं तो इसका असर सीधे बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों की कमी के कारण कई स्कूलों में एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है। इससे पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होती है और छात्रों को नुकसान उठाना पड़ता है।
25 जुलाई की बैठक का भी किया जिक्र
रांका ने केंद्र सरकार के साथ हुई एक बैठक का जिक्र करते हुए कहा कि 25 जुलाई को हुई बातचीत में कुछ मुद्दों पर सहमति बनी थी, लेकिन बाद में उन्हें लागू नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इससे सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन या मांग का समाधान बातचीत और ठोस कार्रवाई से होना चाहिए। केवल आश्वासन देने से समस्याएं खत्म नहीं होतीं।
शिक्षक भर्ती को लेकर बढ़ रही मांग
देश के अलग-अलग राज्यों में लंबे समय से शिक्षक भर्ती की मांग उठती रही है। बेरोजगार अभ्यर्थी भी खाली पदों को भरने की मांग करते रहे हैं। उनका कहना है कि एक तरफ लाखों युवा शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे हैं और दूसरी तरफ स्कूलों में पद खाली पड़े हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षकों की मौजूदगी जरूरी है।
शिक्षा व्यवस्था सुधारने की जरूरत
भारत में सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ते हैं। ऐसे में इन स्कूलों की गुणवत्ता सुधारना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। शिक्षकों की कमी दूर करने के साथ-साथ स्कूलों में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा। केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा।
आगे की रणनीति पर नजर
आशुतोष रांका ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकारों से जवाब मांगने की बात कही है। उन्होंने कहा कि बच्चों के भविष्य से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।
अब देखना होगा कि शिक्षक पदों की कमी और सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सरकार की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है। फिलहाल 10 लाख शिक्षक पदों के दावे ने शिक्षा व्यवस्था पर एक नई बहस जरूर शुरू कर दी है।