परिसीमन बिल से पहले ऑल-पार्टी मीटिंग बुलाने की खड़गे की मांग, PM को लिखा पत्र
नई दिल्ली: कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि संसद के आगामी मानसून सत्र में संशोधित परिसीमन विधेयक (Revised Delimitation Bill) पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई जाए। उन्होंने कहा कि परिसीमन से जुड़ा यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है और इसका देश के राजनीतिक भविष्य पर लंबे समय तक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए व्यापक चर्चा और आम सहमति जरूरी है।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि किसी भी बड़े संवैधानिक और लोकतांत्रिक बदलाव से पहले सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लिया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि सरकार विधेयक को संसद में पेश करने से पहले विपक्ष और अन्य दलों के साथ चर्चा करे, ताकि सभी पक्षों की राय सामने आ सके और एक सहमति आधारित रास्ता तैयार किया जा सके।
खड़गे ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि उन्होंने पहले भी संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से परिसीमन प्रस्ताव पर चर्चा के लिए मार्च और अप्रैल में सर्वदलीय बैठक बुलाने का अनुरोध किया था। हालांकि, उनके अनुसार सरकार ने इस मांग पर कोई पहल नहीं की।
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध देश के राज्यों के प्रतिनिधित्व, राजनीतिक संतुलन और संघीय ढांचे से जुड़ा हुआ है। इसलिए इस मुद्दे पर सभी राज्यों और राजनीतिक दलों की चिंताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि परिसीमन प्रक्रिया का असर लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन पर पड़ सकता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी भी राज्य या क्षेत्र के प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
खड़गे ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि सरकार संसद के मानसून सत्र में विधेयक लाने से पहले सभी दलों के साथ विचार-विमर्श करे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय महत्व के ऐसे विषयों पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर व्यापक सहमति बनाना लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा है।
परिसीमन को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा होती रही है। संविधान के अनुसार, जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाता है। हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर राज्यों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं।
कुछ राज्यों का तर्क रहा है कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण और विकास के अन्य मानकों पर बेहतर प्रदर्शन किया है, उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी नहीं होनी चाहिए। वहीं, कुछ अन्य पक्षों का कहना है कि जनसंख्या के वर्तमान आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए प्रतिनिधित्व का पुनर्संतुलन जरूरी है।
कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल पहले भी परिसीमन प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर चुके हैं। विपक्ष का कहना है कि इस तरह के महत्वपूर्ण निर्णयों में राज्यों और राजनीतिक दलों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने पत्र में यह भी कहा कि संसद में किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय सभी हितधारकों से बातचीत करे।
वहीं, सरकार की ओर से परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर आधिकारिक रुख और आगे की प्रक्रिया पर विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है। हालांकि, मानसून सत्र से पहले इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है।
संसद का आगामी सत्र परिसीमन सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा का केंद्र बन सकता है। विपक्ष की ओर से इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगे जाने की संभावना है, जबकि सरकार विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, परिसीमन जैसे मुद्दों पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है। इसका कारण यह है कि इसका प्रभाव केवल चुनावी व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल, मल्लिकार्जुन खड़गे की मांग के बाद परिसीमन प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अब नजर इस बात पर होगी कि सरकार विपक्ष की इस मांग पर क्या कदम उठाती है और क्या मानसून सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक आयोजित की जाती है।