दिल्ली : दक्षिण एशिया की कूटनीति में इन दिनों दो पड़ोसी देशों के नेताओं की भारत नीति चर्चा का विषय बनी हुई है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह जहां अपने पहले आधिकारिक विदेश दौरे के लिए दिल्ली को प्राथमिकता देने जा रहे हैं, वहीं बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा लगातार टलती नजर आ रही है। भारत ने तारिक रहमान को दिल्ली आने का न्योता दिया था, लेकिन अब तक वह यात्रा नहीं हो सकी। 
इन दोनों घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बालेन शाह ने तमाम क्षेत्रीय समीकरणों के बीच भारत को क्यों चुना और तारिक रहमान के मामले में ऐसी स्थिति क्यों बनी कि आमंत्रण के बावजूद वह दिल्ली नहीं पहुंचे।
बालेन शाह की दिल्ली यात्रा क्यों अहम?
नेपाल और भारत के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से बेहद गहरे रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा, व्यापार, धार्मिक पर्यटन और लोगों के बीच मजबूत संपर्क है। नेपाल में हालिया प्राकृतिक आपदा के दौरान भारत ने राहत और बचाव में सहयोग किया, जिसके बाद दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग को लेकर सकारात्मक माहौल बना।
बालेन शाह का दिल्ली दौरा इसी रिश्ते को आगे बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के नए नेतृत्व के लिए भारत के साथ संबंधों को मजबूत करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
नेपाल चीन और भारत दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में बालेन शाह का भारत को पहली प्राथमिकता देना यह संकेत माना जा रहा है कि काठमांडू नई दिल्ली के साथ अपने पारंपरिक रिश्तों को मजबूत रखना चाहता है।
तारिक रहमान की दिल्ली यात्रा क्यों अटकी?
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा को लेकर काफी उम्मीदें थीं। भारत की ओर से उन्हें आमंत्रण दिया गया था और दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत की संभावना जताई जा रही थी। लेकिन यात्रा की तारीखों और कार्यक्रम को लेकर अंतिम सहमति नहीं बन सकी।
जानकारों के अनुसार, भारत और बांग्लादेश के संबंध हाल के वर्षों में कई संवेदनशील मुद्दों से प्रभावित हुए हैं। इनमें राजनीतिक बदलाव, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में रहना और दोनों देशों के बीच उठे कुछ कूटनीतिक मतभेद शामिल हैं।
बांग्लादेश सरकार ने भी कहा है कि भारत के साथ संबंध बेहतर रखने की इच्छा है, लेकिन राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए जाएंगे।
क्या यह भारत से दूरी का संकेत है?
विशेषज्ञों का कहना है कि तारिक रहमान का दिल्ली न आना सीधे तौर पर भारत से दूरी का संकेत नहीं माना जा सकता। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नेताओं की यात्राएं कई राजनीतिक और कूटनीतिक समीकरणों पर निर्भर करती हैं।
कई बार घरेलू राजनीति, बातचीत के एजेंडे और दोनों देशों के बीच सहमति बनने में समय लगने के कारण यात्राएं टल जाती हैं। हालांकि, यह भी सच है कि किसी पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री की यात्रा क्षेत्रीय संदेश देती है और इसलिए इसका राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
भारत के लिए दोनों यात्राओं का महत्व
भारत के लिए नेपाल और बांग्लादेश दोनों ही रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण पड़ोसी देश हैं। नेपाल भारत की सुरक्षा और हिमालयी क्षेत्र के लिहाज से अहम है, जबकि बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बालेन शाह का दिल्ली आना भारत-नेपाल संबंधों में नई ऊर्जा का संकेत माना जा रहा है। वहीं तारिक रहमान की यात्रा को लेकर अनिश्चितता यह दिखाती है कि भारत-बांग्लादेश संबंधों में कुछ मुद्दों पर अभी बातचीत की जरूरत है।
दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीति
दक्षिण एशिया में भारत, चीन और अन्य देशों के बीच प्रभाव की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पड़ोसी देशों के नेताओं के विदेश दौरे केवल औपचारिक मुलाकात नहीं होते, बल्कि वे भविष्य की कूटनीतिक दिशा का संकेत भी देते हैं।
बालेन शाह का दिल्ली चयन जहां भारत-नेपाल रिश्तों की मजबूती को दर्शाता है, वहीं तारिक रहमान की रुकी यात्रा यह बताती है कि क्षेत्रीय राजनीति में संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है।
फिलहाल नजर इस बात पर है कि बालेन शाह की दिल्ली यात्रा के दौरान किन मुद्दों पर चर्चा होती है और भारत-बांग्लादेश के बीच तारिक रहमान की संभावित यात्रा को लेकर आगे क्या प्रगति होती है। आने वाले समय में दोनों घटनाएं दक्षिण एशिया की कूटनीति पर असर डाल सकती हैं।
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