New Delhi. नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद के बीच ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग को नए नाम और सिंबल के विकल्प सौंप दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, गुट ने तीन नाम और दो चुनाव चिह्न के विकल्प आयोग के सामने रखे हैं। चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश के बाद दोनों गुटों को पार्टी के मूल नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और आरक्षित चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया गया है। आयोग ने दोनों पक्षों को नए नाम और स्वतंत्र चुनाव चिह्न के विकल्प देने के लिए कहा था।
नाम में TMC और ममता की पहचान रखने की कोशिश
सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी गुट ने जो तीन नाम सुझाए हैं, उनमें तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी से जुड़ी पहचान को बनाए रखने की कोशिश की गई है। गुट की रणनीति पार्टी की पुरानी पहचान और नेतृत्व से जुड़े नाम को बरकरार रखने की है। वहीं, नए चुनाव चिह्न के विकल्पों में खेल से जुड़े प्रतीकों को प्राथमिकता दी गई है। बताया जा रहा है कि इन प्रतीकों का चयन चुनाव आयोग की उपलब्ध फ्री सिंबल सूची से किया गया है। हालांकि, अंतिम फैसला चुनाव आयोग को करना है। आयोग ही तय करेगा कि दोनों गुटों को कौन सा नाम और कौन सा चुनाव चिह्न आवंटित किया जाएगा।
TMC नाम और सिंबल पर आयोग ने लगाई थी रोक
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुटों के बीच विवाद के बाद चुनाव आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत बड़ा फैसला लिया था। आयोग ने दोनों पक्षों को आगामी उपचुनावों के लिए पुराने नाम और सिंबल का इस्तेमाल करने से रोक दिया था। आयोग के अनुसार, दोनों पक्ष खुद को असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा कर रहे थे। ऐसे में अंतिम निर्णय आने तक दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने का निर्देश दिया गया।
दोनों गुटों ने आयोग के सामने रखा था दावा
पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों पक्षों ने चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया था। दोनों गुटों की ओर से अपने-अपने दावे, दस्तावेज और तर्क आयोग के सामने रखे गए। आयोग ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि विवाद का अंतिम समाधान प्रक्रिया के तहत किया जाएगा। फिलहाल उपचुनावों को देखते हुए अंतरिम व्यवस्था लागू की गई है।
उपचुनावों से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल
टीएमसी के नाम और सिंबल को लेकर फैसला ऐसे समय आया है, जब पश्चिम बंगाल में उपचुनाव होने हैं। पुराने चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक के बाद दोनों गुटों के सामने नई पहचान के साथ चुनाव मैदान में उतरने की चुनौती है। अब सभी की नजर चुनाव आयोग के अगले फैसले पर है। आयोग की मंजूरी के बाद ही दोनों गुटों की चुनावी पहचान स्पष्ट हो सकेगी।