दिलीप सांगाणी का बयान: सहकारी संस्थाएं रोजगार और विकास में निभाती हैं अहम भूमिका
Delhi दिल्ली। पूर्व मंत्री और सहकारी क्षेत्र के जानकार दिलीप सांगाणी ने कहा कि सहकारी संस्थाएं देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में अहम भूमिका निभाती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन संस्थाओं के माध्यम से रोजगार सृजन, ग्रामीण और आदिवासी समुदायों का समर्थन, तथा आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती है।
सांगाणी ने कहा, “हम पूरे देश को यह संदेश देना चाहते हैं कि सहकारी संस्थाएं रोजगार, स्थिरता और देश के विकास में कितना योगदान दे सकती हैं। यह संस्थाएं केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि किसान, कारीगर और आदिवासी समुदायों के जीवन स्तर को सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनके जरिए सामाजिक कल्याण और सतत विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है।”
उन्होंने यह भी बताया कि सहकारी संस्थाएं भारत की जीडीपी में भी अहम योगदान देती हैं। सांगाणी के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों में चल रही सहकारी परियोजनाएं रोजगार के अवसर पैदा करती हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती हैं। किसानों, छोटे उद्योगों और कारीगरों के लिए सहकारी संस्थाएं वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करती हैं, जिससे उनकी उत्पादकता और आमदनी में वृद्धि होती है।
पूर्व मंत्री ने बताया कि सहकारी संस्थाओं के माध्यम से आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक विकास को भी बढ़ावा मिलता है। आदिवासी और पिछड़े समुदायों के लिए विशेष योजनाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाकर उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। इससे उनके जीवन स्तर में सुधार होता है और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
सांगाणी ने यह भी कहा कि सहकारी संस्थाएं देश में सतत विकास और समान अवसरों के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनके संचालन में पारदर्शिता, सहभागिता और लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया पर जोर दिया जाता है, जिससे सामाजिक और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सहकारी संस्थाओं की भूमिका केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि ये ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में सामाजिक सशक्तिकरण का भी माध्यम हैं। उनके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशिक्षण जैसी सेवाओं का लाभ सीधे उन समुदायों तक पहुंचता है जो पारंपरिक तौर पर मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से दूर रहे हैं।
दिलीप सांगाणी ने अंत में कहा कि देश के विकास के लिए सहकारी संस्थाओं को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है। सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर इन संस्थाओं का समर्थन करना चाहिए, ताकि रोजगार, उत्पादन और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में व्यापक सुधार किया जा सके।
उनके इस बयान को सहकारी क्षेत्र के लिए प्रेरक माना जा रहा है और यह संदेश देता है कि भारत में सतत और समावेशी विकास के लिए सहकारी संस्थाएं केंद्रीय भूमिका निभा सकती हैं।