Delhi अगर सरकार लंबे समय से लंबित मांगों को पूरा करने में विफल रहती है, तो आने वाले महीनों में मजदूर वर्ग पूरे देश में कई दिनों तक चलने वाले विरोध प्रदर्शनों के जरिए अपने आंदोलन को और तेज करेगा। ट्रेड यूनियन संगठन ने बताया कि इस मार्च की तैयारियां अलग-अलग राज्यों में चल रही हैं। दूर-दराज के राज्यों से राष्ट्रीय राजधानी आने वाले प्रतिभागियों ने पहले ही लगभग 40,000 ट्रेन टिकट बुक कर लिए हैं।
CITU ने चार लेबर कोड (श्रम संहिताओं) को रद्द करने, मनरेगा (MGNREGA) को बहाल करने, स्कीम वर्कर्स (योजना कर्मियों) को वैधानिक लाभों के साथ नियमित कर्मचारी का दर्जा देने और सभी श्रमिकों के लिए 42,000 रुपये का न्यूनतम वेतन तय करने की मांग की है। इसके अलावा, उन्होंने स्वरोजगार करने वालों के लिए 42,000 रुपये की न्यूनतम मासिक आय और सभी के लिए 21,000 रुपये की न्यूनतम पेंशन की भी मांग की है। CITU के अध्यक्ष सुदीप दत्ता ने कहा, "1 दिसंबर का मार्च एक साझा राष्ट्रीय मंच पर मजदूर आंदोलनों, किसानों के संघर्षों, छात्र-युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों को एक साथ लाएगा।"
संगठन ने निजीकरण के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई के असर को समझाने के लिए हरियाणा के बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की हालिया 48 घंटे की राज्यव्यापी हड़ताल का उदाहरण दिया। उन्होंने दावा किया कि इस हड़ताल में 40,000 से अधिक कर्मचारियों ने हिस्सा लिया, जिसके चलते राज्य सरकार को गुरुग्राम और नूंह में किसी निजी कंपनी को बिजली वितरण का समानांतर लाइसेंस न देने का नीतिगत निर्देश जारी करना पड़ा।
CITU के अनुसार, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि राज्य में समानांतर लाइसेंसिंग की अनुमति नहीं दी जाएगी। ट्रेड यूनियन ने बताया कि लंबे समय तक बिजली और पानी की कटौती के बावजूद, किसान संगठनों, अन्य ट्रेड यूनियनों और उपभोक्ताओं ने इस हड़ताल का समर्थन किया। दत्ता ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं और अन्य स्कीम वर्कर्स के बढ़ते लामबंद होने का भी जिक्र किया। ये सभी खुद को 'श्रमिक' का दर्जा दिए जाने, न्यूनतम वेतन पाने और भविष्य निधि (PF), कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) व ग्रेच्युटी जैसे वैधानिक लाभों की मांग कर रहे हैं।
CITU ने कहा कि 1 दिसंबर का मार्च, 12 फरवरी की आम हड़ताल के बाद शुरू हुए मजदूर विरोध प्रदर्शनों की लहर को आगे बढ़ाएगा। यह स्थानीय और क्षेत्रीय संघर्षों को रोजगार, वेतन, पेंशन और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी व्यापक मांगों के साथ जोड़ेगा। इस संस्था ने SIR प्रक्रिया को रद्द करने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की भी मांग की है। उनका आरोप है कि इस संशोधन से लाखों लोगों, खासकर मजदूरों, प्रवासियों और गरीबों के मतदान अधिकारों पर खतरा पैदा हो गया है।
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