New Delhi : दिल्ली हाई कोर्ट ने एक याचिका पर नोटिस जारी किया है। इस याचिका में नॉन-शुगर स्वीटनर (NSS) और आर्टिफिशियल स्वीटनर के लंबे समय तक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर का भारत-विशिष्ट वैज्ञानिक मूल्यांकन करने की मांग की गई है। साथ ही, कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) से जवाब भी मांगा है।
कोर्ट ने संबंधित पक्षों को दो हफ़्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर के लिए तय की।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 'इंडियन शुगर एंड बायोएनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन' की बात सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने याचिका में मांगी गई राहतों पर गौर करने के बाद मामले में नोटिस जारी किया और भारत सरकार तथा FSSAI को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया।
याचिकाकर्ता ने FSSAI को निर्देश देने की मांग की है कि वह नॉन-शुगर और आर्टिफिशियल स्वीटनर के लंबे समय तक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर का एक व्यापक, स्वतंत्र और भारत-विशिष्ट वैज्ञानिक मूल्यांकन करे और उसे पूरा करे।
याचिका के अनुसार, इस अध्ययन में मेटाबोलिक स्वास्थ्य, हृदय रोगों, कैंसर के खतरे (कार्सिनोजेनेसिटी), न्यूरोलॉजिकल स्वास्थ्य और भारत में अलग-अलग आबादी समूहों के बीच इनके लंबे समय तक सेवन के तरीकों पर पड़ने वाले असर की जांच की जानी चाहिए।
याचिका में ऐसे स्वीटनर के लंबे समय तक सेवन के बारे में सार्वजनिक सलाह और उपभोक्ता जागरूकता के उपाय करने के निर्देश भी मांगे गए हैं, खासकर बच्चों, किशोरों, गर्भवती महिलाओं, मधुमेह रोगियों और अन्य संवेदनशील समूहों के लिए।
इसके अलावा, याचिका में नॉन-शुगर स्वीटनर वाले उत्पादों की पैकेजिंग, लेबलिंग और मार्केटिंग के लिए सख्त नियम बनाने की मांग की गई है।
इसमें आग्रह किया गया है कि ऐसे उत्पादों को बिना स्पष्ट और प्रमुखता से यह बताए कि उनमें कौन से आर्टिफिशियल स्वीटनर इस्तेमाल किए गए हैं, उन्हें "हेल्दी" (स्वस्थ), "सेफ" (सुरक्षित), "डाइट" या चीनी के फायदेमंद विकल्प के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि वह अधिकारियों को आर्टिफिशियल स्वीटनर वाले उत्पादों से जुड़ी भ्रामक विज्ञापन, ब्रांडिंग और प्रचार संबंधी दावों की जांच करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दे।
इसमें नियामक ढांचे को मजबूत करने की मांग की गई है, जिसके तहत इस्तेमाल किए गए खास स्वीटनर की जानकारी पैकेट के सामने प्रमुखता से देना और उचित चेतावनी संदेश लिखना अनिवार्य हो, ताकि उपभोक्ता सोच-समझकर चुनाव कर सकें।
अंतरिम उपाय के तौर पर, याचिका में मांग की गई है कि जब तक प्रस्तावित वैज्ञानिक मूल्यांकन पूरा नहीं हो जाता, तब तक नॉन-शुगर स्वीटनर वाले खाद्य और पेय उत्पादों के लिए पैकेट के सामने अनिवार्य लेबलिंग और जानकारी देने के नियमों को लागू किया जाए। इसमें ऐसे निर्देश भी मांगे गए हैं जिनसे यह पक्का किया जा सके कि "शुगर फ्री", "ज़ीरो शुगर", "नो एडेड शुगर" और "डाइट" जैसे दावों के साथ-साथ लेबल, विज्ञापनों, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और डिजिटल मीडिया पर नॉन-शुगर स्वीटनर की मौजूदगी और ज़रूरी कानूनी चेतावनी की जानकारी साफ़ तौर पर दी जाए।
हाई कोर्ट ने भारत सरकार और FSSAI को दो हफ़्ते के अंदर अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है, साथ ही याचिकाकर्ता को इसके बाद अपना जवाब (रिज़ॉइंडर) दाखिल करने की छूट भी दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होनी है।