नई दिल्ली। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अपराधों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि देश से बाहर भेजे जाने वाले अवैध धन की वसूली एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। एक कार्यक्रम में आर्थिक अपराधों पर चर्चा करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि जांच एजेंसियां विदेश भेजे गए धन में से हर 100 रुपये में केवल करीब 1 रुपया ही वापस ला पाती हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने आर्थिक अपराधों से निपटने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी को भी एक बड़ी समस्या बताया। उन्होंने कहा कि कई मामलों में आर्थिक अपराधी देश छोड़कर विदेश भाग जाते हैं और उन्हें वापस लाने की प्रक्रिया काफी जटिल हो जाती है। भगोड़ों के प्रत्यर्पण को लेकर विभिन्न देशों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है, ताकि ऐसे अपराधियों पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराध केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनका असर वैश्विक स्तर पर दिखाई देता है। अपराधी अवैध तरीके से अर्जित धन को अलग-अलग देशों में छिपाने और निवेश करने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को कई देशों की मदद और सहयोग की आवश्यकता होती है।
उन्होंने आर्थिक अपराधों को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि इन मामलों में अपराधियों द्वारा अपनाए जाने वाले तरीके लगातार बदल रहे हैं। डिजिटल माध्यमों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क के इस्तेमाल से धन की आवाजाही को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जांच एजेंसियों को आधुनिक तकनीक और बेहतर अंतरराष्ट्रीय समन्वय की जरूरत है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आर्थिक अपराधों के खिलाफ कार्रवाई केवल घरेलू स्तर पर सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए अलग-अलग देशों की एजेंसियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान और कानूनी सहयोग जरूरी है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग मजबूत नहीं होगा तो अपराधियों को पकड़ना और उनसे धन की वसूली करना कठिन बना रहेगा।
उन्होंने भगोड़े आर्थिक अपराधियों के मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि कई आरोपी विदेशों में जाकर कानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लेते हैं और लंबे समय तक कार्रवाई से बचने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में प्रत्यर्पण प्रक्रिया को आसान और प्रभावी बनाने की जरूरत है।
CJI सूर्यकांत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत में आर्थिक अपराधों और अवैध धन के खिलाफ कार्रवाई लगातार चर्चा में है। विभिन्न जांच एजेंसियां मनी लॉन्ड्रिंग, धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई कर रही हैं। हालांकि विदेशों में जमा या भेजे गए धन को वापस लाना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
मनी लॉन्ड्रिंग का मतलब अवैध तरीके से कमाए गए धन को वैध दिखाने की प्रक्रिया से है। इसमें अपराध से प्राप्त धन को कई माध्यमों से घुमाकर उसकी वास्तविक पहचान छिपाने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को धन के स्रोत और उसके अंतिम लाभार्थी तक पहुंचने के लिए लंबी जांच करनी पड़ती है।
आर्थिक अपराधों के बढ़ते मामलों को देखते हुए दुनिया के कई देश आपसी सहयोग बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। भारत भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वित्तीय अपराधों से निपटने और भगोड़ों की वापसी के लिए सहयोग की मांग करता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराधों पर नियंत्रण के लिए केवल सख्त कानून ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि तेज जांच, मजबूत वित्तीय निगरानी और देशों के बीच प्रभावी समन्वय भी जरूरी है। इससे अपराधियों द्वारा धन छिपाने की कोशिशों को रोका जा सकता है।
CJI सूर्यकांत ने अपने बयान के माध्यम से आर्थिक अपराधों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एकजुट प्रयासों की आवश्यकता को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि जब तक विभिन्न देश मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक आर्थिक अपराधियों और विदेशों में छिपाए गए धन के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना मुश्किल रहेगा।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने एक बार फिर मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अपराधों से जुड़ी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया है। अब इस दिशा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने और जांच प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।