नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि पानी तक पहुंच का मतलब केवल घरों में नल कनेक्शन उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि लोगों को नियमित रूप से स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल मिलना भी जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सूखे पाइपों से पानी उपलब्ध कराने का वादा पूरा नहीं हो सकता और दूषित पानी लोगों के जीवन तथा स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के स्थापना दिवस समारोह और ‘जल–जीवन का अमृत’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सुरक्षित और भरोसेमंद पानी की उपलब्धता को इंसानी गरिमा बनाए रखने तथा संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने के लिए आवश्यक बताया।

उनका संदेश स्पष्ट था कि पानी की सुविधा को केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण तक सीमित नहीं रखा जा सकता। नल कनेक्शन तभी सार्थक है, जब उससे लोगों को नियमित रूप से उपयोग के योग्य पानी मिले। यदि पाइपलाइन तो बिछा दी जाए, लेकिन पानी उपलब्ध न हो या दूषित पानी मिले, तो इससे लोगों की वास्तविक जरूरत पूरी नहीं होती।

सिर्फ नल कनेक्शन देने से नहीं पूरी होगी जिम्मेदारी

CJI सूर्यकांत ने अपने संबोधन में कहा कि पानी तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए घरों में नल कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लोगों को नियमित और सुरक्षित जलापूर्ति मिले।

उन्होंने सूखे पाइपों का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल कनेक्शन देने से पानी उपलब्ध कराने का वादा पूरा नहीं हो सकता। किसी परिवार के घर में नल लगा होना तभी उपयोगी है, जब जरूरत के समय उसमें पानी आए और वह पानी पीने तथा दैनिक इस्तेमाल के लिए सुरक्षित हो।

जलापूर्ति की व्यवस्था में पानी की उपलब्धता, गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति महत्वपूर्ण पहलू हैं। यदि इनमें से किसी एक में भी कमी रह जाती है, तो लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में परेशानी हो सकती है।

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने जल योजनाओं के मूल्यांकन में केवल कनेक्शन की संख्या के बजाय वास्तविक जलापूर्ति और पानी की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित किया।

दूषित पानी जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा

CJI सूर्यकांत ने दूषित पानी से होने वाले खतरों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि असुरक्षित पानी लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए जलापूर्ति के साथ पानी की शुद्धता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

पानी मानव जीवन की बुनियादी जरूरत है। इसका इस्तेमाल पीने, भोजन तैयार करने और दैनिक गतिविधियों में होता है। ऐसे में यदि लोगों को दूषित पानी मिलता है, तो उनकी सेहत प्रभावित होने का खतरा रहता है।

इस संदर्भ में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केवल जल स्रोत या पाइपलाइन तैयार करने तक सीमित नहीं है। पानी की गुणवत्ता की निगरानी और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।

मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि पानी से जुड़ी योजनाओं का उद्देश्य लोगों को वास्तविक सुविधा उपलब्ध कराना होना चाहिए। केवल कागजों पर कनेक्शन उपलब्ध होने से यह साबित नहीं होता कि हर व्यक्ति को सुरक्षित पानी मिल रहा है।

सुरक्षित पानी इंसानी गरिमा से जुड़ा मुद्दा

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस समारोह में बोलते हुए CJI सूर्यकांत ने सुरक्षित और भरोसेमंद पानी की उपलब्धता को इंसानी गरिमा से जोड़ा। उन्होंने कहा कि लोगों को स्वच्छ पानी उपलब्ध होना उनके सम्मानजनक जीवन और संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने के लिए जरूरी है।

इंसानी गरिमा का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए आवश्यक सुविधाएं मिलें। पानी की कमी या दूषित जल की समस्या लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसलिए सुरक्षित पेयजल तक पहुंच को केवल सुविधा के तौर पर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण विषय के रूप में देखा जाना चाहिए।

जल सुरक्षा का सवाल ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। नियमित जलापूर्ति, भरोसेमंद वितरण व्यवस्था और पानी की गुणवत्ता बनाए रखना उन बुनियादी पहलुओं में शामिल हैं, जिनका ध्यान रखना आवश्यक है।

मानवाधिकारों के संदर्भ में जल सुरक्षा पर चर्चा

‘जल–जीवन का अमृत’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन में पानी की उपलब्धता और मानवाधिकारों के बीच संबंध को प्रमुखता दी गई। CJI सूर्यकांत का संबोधन इस बात पर केंद्रित रहा कि सुरक्षित पानी की सुविधा लोगों के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जरूरी है।

जल योजनाओं की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि कितने घरों में नल लगाए गए हैं। यह देखना भी जरूरी है कि लोगों को वास्तव में पानी मिल रहा है या नहीं, उसकी गुणवत्ता कैसी है और आपूर्ति कितनी भरोसेमंद है।

यदि किसी क्षेत्र में नल कनेक्शन होने के बावजूद पानी नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होता, तो वहां लोगों की मूल जरूरत पूरी नहीं हो पाती। इसी तरह, यदि पानी दूषित है, तो उसका उपलब्ध होना भी स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा कर सकता है।

जल योजनाओं में गुणवत्ता और नियमितता जरूरी

CJI सूर्यकांत की टिप्पणी ने जलापूर्ति व्यवस्था की गुणवत्ता और उसकी उपयोगिता पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षित पानी तक पहुंच इंसानी गरिमा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी हुई है।

उनके संदेश के अनुसार, पानी की योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति तक नियमित, स्वच्छ और भरोसेमंद जल पहुंचाना होना चाहिए। इसके लिए केवल बुनियादी ढांचे का निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सम्मेलन में दिया गया यह संदेश जल सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। पानी की सुविधा तभी प्रभावी मानी जा सकती है, जब उसका लाभ लोगों को वास्तविक रूप से मिले।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपने संबोधन में साफ संकेत दिया कि नल कनेक्शन उपलब्ध कराना शुरुआत भर है। लोगों को सुरक्षित पानी नियमित रूप से उपलब्ध कराना ही उस व्यवस्था की वास्तविक सफलता है।

Tags: