नई दिल्ली। देश में वोट चोरी और चुनावी धांधली के आरोपों को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से भाजपा और चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोपों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने अब कांग्रेस के पुराने राजनीतिक इतिहास को लेकर पलटवार किया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने वर्ष 1972 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से जुड़ी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की एक पुरानी रिपोर्ट सोशल मीडिया पर साझा की है। इस दस्तावेज में तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर चुनावी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर धांधली, बूथ कब्जाने और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे। दुबे ने इसी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस और राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए सवाल उठाया कि आज चुनावी निष्पक्षता की बात करने वाले दल अपने राजनीतिक अतीत को लेकर क्या जवाब देंगे।

54 साल पुरानी रिपोर्ट से कांग्रेस पर निशाना

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पश्चिम बंगाल के 1972 विधानसभा चुनाव से संबंधित माकपा के दस्तावेज साझा करते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला।

दस्तावेज के अनुसार, उस समय माकपा ने कांग्रेस पर चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया था।

माकपा ने दावा किया था कि कांग्रेस ने संभावित चुनावी हार को जीत में बदलने के लिए मतदान और मतगणना की प्रक्रियाओं को प्रभावित किया।

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि मतदाताओं को मतदान करने से रोका गया, मतदान केंद्रों पर कब्जा किया गया और मतपेटियों में गड़बड़ी की गई।

हालांकि ये आरोप उस समय माकपा की ओर से लगाए गए थे। रिपोर्ट के सभी दावों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

बूथ कब्जाने और मतपेटियां बदलने के आरोप

निशिकांत दुबे की ओर से साझा दस्तावेजों में चुनावी अनियमितताओं के कई उदाहरण दिए गए हैं।

माकपा की पश्चिम बंगाल राज्य समिति द्वारा 16 मार्च 1972 को जारी एक दस्तावेज में आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस ने कई मतदान केंद्रों पर अपने समर्थकों और असामाजिक तत्वों की मदद से कब्जा कराया।

दस्तावेज में यह भी दावा किया गया कि कुछ स्थानों पर मतदाताओं को डराया गया और उनकी इच्छा के विरुद्ध मतपत्रों पर मुहर लगाई गई।

इसके अलावा मतपेटियों को बदलने और उनमें मतपत्र डालने जैसी कथित अनियमितताओं का भी उल्लेख किया गया था।

माकपा ने आरोप लगाया था कि पुलिस और प्रशासन के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध रही थी।

550 वोट पड़े, मतपेटी से निकले 685 मतपत्र

पुरानी रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से जुड़े कई गंभीर आरोप दर्ज हैं।

दस्तावेज के मुताबिक, डोमकल विधानसभा क्षेत्र के बूथ संख्या 55 पर कुल 550 वोट पड़ने की बात दर्ज थी, लेकिन मतपेटी खोलने पर 685 मतपत्र मिलने का दावा किया गया।

इसी तरह कालना क्षेत्र में मतगणना के दौरान एक अधिकारी पर माकपा के पक्ष में पड़े मतपत्रों को अवैध घोषित करने का आरोप लगाया गया था।

उलबेड़िया दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में भी मतगणना के आंकड़ों में कथित हेरफेर का आरोप सामने आया था।

इन उदाहरणों के जरिए माकपा ने तत्कालीन चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। हालांकि इन आरोपों की अंतिम न्यायिक पुष्टि से संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं है।

ज्योति बसु की हार पर भी उठाए थे सवाल

1972 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वरिष्ठ वामपंथी नेता ज्योति बसु की हार भी विवाद का विषय बनी थी।

ज्योति बसु बारानगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव परिणाम में उन्हें 39 हजार से अधिक मतों के अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा था।

माकपा ने उनकी हार को संदिग्ध बताते हुए आरोप लगाया था कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया गया।

निशिकांत दुबे ने अपनी पोस्ट में दावा किया कि मतगणना के दौरान ज्योति बसु के साथ धक्का-मुक्की हुई और उन्हें मतगणना कक्ष से बाहर निकाल दिया गया।

हालांकि यह दुबे द्वारा साझा किए गए ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित आरोप है।

ज्योति बसु बाद में वर्ष 1977 में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने और लगभग 23 वर्षों तक इस पद पर रहे।

राहुल गांधी पर निशिकांत दुबे का तंज

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इन दस्तावेजों का हवाला देते हुए राहुल गांधी पर निशाना साधा।

उन्होंने सवाल उठाया कि जिस कांग्रेस पर कभी वामपंथी दल चुनावी धांधली के आरोप लगाते थे, आज वही दल चुनाव आयोग और भाजपा के खिलाफ एक साथ आवाज क्यों उठा रहे हैं।

दुबे ने विपक्ष की ओर से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता पर उठाए जा रहे सवालों का भी उल्लेख किया।

उन्होंने तर्क दिया कि कागजी मतपत्रों के दौर में भी बूथ कब्जाने और मतदान प्रक्रिया प्रभावित करने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं।

भाजपा सांसद ने कहा कि विपक्ष को अपने राजनीतिक इतिहास पर भी विचार करना चाहिए।

वोट चोरी के आरोपों को लेकर जारी है विवाद

कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठा रहे हैं।

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

उनका आरोप है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया का इस्तेमाल चुनावी परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है।

हालांकि भाजपा और चुनाव आयोग इन आरोपों का विरोध करते रहे हैं।

चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अद्यतन करने का उद्देश्य मृत, दोहराए गए और अयोग्य मतदाताओं की प्रविष्टियों को हटाकर सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है।

1972 में कांग्रेस ने बनाई थी सरकार

वर्ष 1972 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गठबंधन को बड़ी जीत मिली थी।

इसके बाद सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में सरकार बनी थी।

माकपा ने चुनाव परिणामों को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई थीं और विधानसभा की कार्यवाही में भाग नहीं लेने का फैसला किया था।

उस समय वामपंथी दलों ने कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव निष्पक्ष नहीं होने का आरोप लगाया था।

इस तरह पश्चिम बंगाल का 1972 का चुनाव लंबे समय तक राजनीतिक विवाद का विषय बना रहा।

पुराने आरोपों से वर्तमान विवाद पर नई बहस

भाजपा की ओर से 54 वर्ष पुराने दस्तावेज सामने लाए जाने के बाद चुनावी निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहस का नया अध्याय शुरू हो गया है।

भाजपा इन दस्तावेजों के आधार पर कांग्रेस और वामपंथी दलों के मौजूदा राजनीतिक रुख पर सवाल उठा रही है।

दूसरी ओर, वर्तमान मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित आरोपों की जांच उनके अपने साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर होना आवश्यक है।

किसी पार्टी पर अतीत में लगे आरोप अपने आप वर्तमान विवादों को सही या गलत साबित नहीं करते।

फिलहाल निशिकांत दुबे की ओर से साझा की गई 1972 की रिपोर्ट ने भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी को और तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में इस मामले पर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी।

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