नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान बढ़ने वाले वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए केंद्र सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने अपनी निगरानी तेज कर दी है। धान की कटाई के मौजूदा मौसम में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से आयोग की एक उच्चस्तरीय टीम ने पंजाब के रोपड़, होशियारपुर और अमृतसर में विभिन्न औद्योगिक तथा कृषि संस्थानों का निरीक्षण किया। इस दौरान थर्मल पावर प्लांट, कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट, कृषि विज्ञान केंद्र, खेतों और बायोमास संयंत्रों में पराली प्रबंधन से संबंधित व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई।पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, निरीक्षण का मुख्य उद्देश्य खेतों में पराली जलाने की आवश्यकता कम करने के लिए उपलब्ध तकनीकों और व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति का आकलन करना था।
पंजाब के तीन जिलों में पराली प्रबंधन की समीक्षा
सीएक्यूएम की उच्चस्तरीय टीम ने पंजाब के विभिन्न स्थानों का दौरा करके पराली प्रबंधन के लिए अपनाए जा रहे उपायों की जानकारी ली।टीम ने थर्मल पावर प्लांट और बायोमास संयंत्रों में कृषि अवशेषों के इस्तेमाल की संभावनाओं की समीक्षा की। इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्रों में पराली प्रबंधन की आधुनिक मशीनों का प्रदर्शन भी देखा।अधिकारियों ने खेतों में जाकर किसानों के स्तर पर उपलब्ध व्यवस्थाओं और तकनीकों के उपयोग की जानकारी ली।आयोग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को पराली जलाने के बजाय उसके उपयोग और निस्तारण के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध हों।
थर्मल पावर प्लांट को दिए महत्वपूर्ण निर्देश
निरीक्षण के दौरान सीएक्यूएम ने राज्य के संबंधित अधिकारियों को थर्मल पावर प्लांट में बायोमास को-फायरिंग के निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने का निर्देश दिया।को-फायरिंग एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें बिजली उत्पादन के दौरान कोयले जैसे पारंपरिक ईंधन के साथ कृषि अवशेषों से तैयार बायोमास का भी इस्तेमाल किया जाता है।इससे पराली के औद्योगिक उपयोग को बढ़ावा मिल सकता है और खेतों में इसे जलाने की आवश्यकता कम हो सकती है।आयोग ने स्पष्ट किया कि बायोमास के इस्तेमाल के दौरान उत्सर्जन संबंधी निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
कृषि विज्ञान केंद्र में मशीनों का प्रदर्शन
सीएक्यूएम की टीम ने कृषि विज्ञान केंद्र के दौरे के दौरान पराली प्रबंधन में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न मशीनों और उपकरणों का प्रदर्शन देखा।इन मशीनों का उपयोग खेतों में फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाने, काटने, एकत्र करने या अन्य स्थानों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है।अधिकारियों ने इन-सीटू और एक्स-सीटू तकनीकों की उपयोगिता की समीक्षा की।इन-सीटू तकनीक में पराली को खेत में ही प्रबंधित किया जाता है, जबकि एक्स-सीटू तकनीक में कृषि अवशेषों को खेत से बाहर ले जाकर ऊर्जा उत्पादन, बायोगैस या अन्य औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है।
सीबीजी प्लांट में पराली के उपयोग पर जोर
निरीक्षण के दौरान कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्र में कृषि अवशेषों के उपयोग की संभावनाओं की भी समीक्षा की गई।सीबीजी संयंत्रों में उपयुक्त कृषि अवशेषों को संसाधित करके बायोगैस तैयार की जा सकती है। इससे किसानों को पराली के निस्तारण का वैकल्पिक रास्ता मिलता है।पराली आधारित उद्योगों का विस्तार होने से कृषि अवशेषों की खरीद, संग्रहण और परिवहन से संबंधित आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है।
पंजाब में निगरानी और सख्त करने के निर्देश
आयोग ने पंजाब सरकार और जिला प्रशासन से पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाने के लिए निगरानी बढ़ाने को कहा है।22 अक्टूबर को पंजाब और हरियाणा की सरकारों के साथ हुई समीक्षा बैठक में भी सीएक्यूएम अध्यक्ष राजेश वर्मा ने फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों के बेहतर इस्तेमाल, निगरानी और प्रशासनिक समन्वय पर जोर दिया था।आयोग ने जिला अधिकारियों को निर्देश दिया कि किसानों तक मशीनों की पहुंच सुनिश्चित की जाए और पराली एकत्र करने वाली एजेंसियों तथा उद्योगों के बीच समन्वय बढ़ाया जाए।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण रोकना बड़ी चुनौती
धान की कटाई के बाद पराली जलाने से निकलने वाला धुआं उत्तर भारत में वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले कारणों में शामिल है।सर्दियों में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषक तत्वों का जमाव बढ़ सकता है। ऐसे में पराली जलाने की घटनाओं को रोकना महत्वपूर्ण माना जाता है।सीएक्यूएम ने पंजाब के 18 जिलों में उड़नदस्तों की तैनाती भी की है, जो 30 नवंबर तक निगरानी के लिए निर्धारित हैं।आयोग का कहना है कि पराली प्रबंधन के लिए किसानों, उद्योगों और प्रशासन को मिलकर काम करना होगा। खेतों में उपयुक्त मशीनों की उपलब्धता और पराली के औद्योगिक उपयोग को बढ़ाकर जलाने की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।
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