नई दिल्ली: भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत इंडियन फार्माकोपिया कमीशन (IPC) ने देश में फार्माकोपिया मानकों और दवाओं की गुणवत्ता को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए, कोलकाता में सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी (CDL) और सेंट्रल कॉस्मेटिक्स लेबोरेटरी (CCL) में अपनी पहली इंटरैक्टिव बैठक आयोजित की।
इस बैठक का मुख्य विषय "IP 2026: दृष्टिकोण, सुझाव और आगे की राह" था। इसमें विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों को एक साथ लाकर फार्माकोपिया मानकों और दवाओं की गुणवत्ता के लिए आगे की राह पर चर्चा की गई। साथ ही, दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और असरदार होने को सुनिश्चित करने में इंडियन फार्माकोपिया रेफरेंस स्टैंडर्ड्स और अशुद्धि मानकों (इम्प्योरिटी स्टैंडर्ड्स) के महत्व पर भी बात की गई।
इस कार्यक्रम की एक बड़ी खासियत सात इंडियन फार्माकोपिया नाइट्रोसामाइन इम्प्योरिटी रेफरेंस स्टैंडर्ड्स की लॉन्चिंग थी। IPC द्वारा इन महत्वपूर्ण रेफरेंस स्टैंडर्ड्स को पहली बार पेश किया गया।
लॉन्च किए गए सात मानक ये हैं: N-नाइट्रोसोडाइमिथाइलमाइन (NDMA), N-नाइट्रोसोडाइएथिलमाइन (NDEA), N-नाइट्रोसोएथिलआइसोप्रोपाइलमाइन (NEIPA), N-नाइट्रोसोडाइब्यूटाइलमाइन (NDBA), N-नाइट्रोसोमिथाइलफेनिलमाइन (NMPA), N-नाइट्रोसोडाईआइसोप्रोपाइलमाइन (NDIPA), और N-नाइट्रोसो-N-मिथाइल-4-अमीनोब्यूटिरिक एसिड (NMBA)।
नाइट्रोसामाइन बहुत शक्तिशाली जीनोटॉक्सिक और कैंसरकारी यौगिक होते हैं जो दवा बनाने, स्टोर करने, पैकेजिंग के दौरान या दवा उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न सामग्रियों से संदूषण (contamination) के कारण अनजाने में बन सकते हैं। हाइपरटेंशन, पेट की बीमारियों, डायबिटीज और टीबी जैसी बीमारियों के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं में इन अशुद्धियों को नियंत्रित करना बहुत महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, सात अशुद्धि रेफरेंस स्टैंडर्ड्स की लॉन्चिंग दवाओं में नाइट्रोसामाइन अशुद्धियों का सटीक पता लगाने और उनकी मात्रा मापने की भारत की क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। यह पहल दवा परीक्षण, विधि सत्यापन (method validation), गुणवत्ता आश्वासन और नियामक अनुपालन में मदद करेगी, साथ ही अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के साथ तालमेल और महत्वपूर्ण रेफरेंस सामग्रियों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगी।
इंडियन फार्माकोपिया कमीशन के सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक वी. कलाईसेल्वन ने अपने उद्घाटन भाषण में दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए CDL प्रयोगशाला के साथ मिलकर काम करने के महत्व पर जोर दिया। इस कार्यक्रम में IPGMER कोलकाता में फार्माकोलॉजी की प्रोफ़ेसर और हेड सुपर्णा चटर्जी और सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी के डायरेक्टर राकेश कुमार ऋषि भी शामिल हुए।
यह बैठक रेगुलेटरी अथॉरिटी, लेबोरेटरी और IPC के विशेषज्ञों के लिए एक मंच थी, जहाँ उन्होंने अपने विचार और सुझाव साझा किए और इंडियन फार्माकोपिया तथा राष्ट्रीय दवा गुणवत्ता इकोसिस्टम को और मज़बूत बनाने में योगदान दिया।
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