दलित सम्मान की लड़ाई या सियासी रणनीति कांग्रेस के निशाने पर यूपी और देश
दिल्ली : कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े कथित अपमान के मुद्दे को अब केवल एक नेता से जुड़ा मामला नहीं रहने दिया है। पार्टी इसे दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और संविधान की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है। कांग्रेस का पूरा फोकस इस मुद्दे को बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदलने पर है, ताकि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इसका फायदा उठाया जा सके।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक कांग्रेस की रणनीति साफ है। पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण से जुड़े मुद्दों को उठाकर जिस तरह विपक्षी एकजुटता और दलित-पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने में सफल रही थी, उसी तरह अब दलित सम्मान के मुद्दे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
क्या है पूरा मामला?
मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कथित तौर पर कार्यक्रम स्थल के "शुद्धिकरण" को लेकर विवाद शुरू हुआ। कांग्रेस ने इसे दलित नेता के अपमान और छुआछूत की मानसिकता से जोड़ते हुए भाजपा और उससे जुड़े संगठनों पर निशाना साधा। राहुल गांधी ने भी इस मामले को उठाते हुए इसे सामाजिक भेदभाव से जुड़ा मुद्दा बताया।
कांग्रेस का कहना है कि यह सिर्फ पार्टी अध्यक्ष खरगे का मामला नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों दलितों के सम्मान से जुड़ा सवाल है। इसी वजह से पार्टी इस मुद्दे को लगातार आगे बढ़ा रही है और विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है।
2027 के चुनाव में कहां है कांग्रेस का निशाना?
कांग्रेस की सबसे बड़ी नजर उत्तर प्रदेश पर मानी जा रही है। 2027 में यूपी विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां दलित मतदाता चुनावी समीकरण बदलने की ताकत रखते हैं। प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए बड़ी संख्या में सीटें आरक्षित हैं और दलित वोट बैंक पर सभी राजनीतिक दलों की नजर रहती है।
कांग्रेस की कोशिश है कि वह दलितों के बीच अपनी पुरानी पकड़ वापस बनाए। पार्टी मानती है कि अगर दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उसके साथ आता है तो यूपी में उसका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है।
हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी बड़ी है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से दलित राजनीति का बड़ा चेहरा रही है। वहीं आजाद समाज पार्टी जैसे नए दल भी दलित युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
पंजाब पर भी नजर
कांग्रेस की रणनीति केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। पंजाब में भी दलित मतदाता काफी अहम भूमिका निभाते हैं। राज्य में अनुसूचित जाति समुदाय की बड़ी आबादी है और विधानसभा चुनाव में यह वर्ग निर्णायक साबित हो सकता है।
कांग्रेस चाहती है कि दलित सम्मान का मुद्दा पंजाब में भी राजनीतिक लाभ दे। हालांकि वहां आम आदमी पार्टी, बसपा और अन्य दल भी दलित वोटों को साधने की कोशिश कर रहे हैं।
2029 लोकसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा बड़ा नैरेटिव?
कांग्रेस की रणनीति को केवल विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं देखा जा रहा है। पार्टी 2029 लोकसभा चुनाव के लिए भी अभी से सामाजिक मुद्दों पर अपनी जमीन तैयार करना चाहती है।
2024 में संविधान बचाने और आरक्षण के मुद्दे ने विपक्ष को मजबूती दी थी। कांग्रेस अब दलित अधिकार, सामाजिक न्याय और समानता जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर भाजपा के खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक विमर्श तैयार करना चाहती है।
BJP के लिए क्यों चुनौती?
बीजेपी लंबे समय से दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। केंद्र सरकार की योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों के जरिए पार्टी दलित और गरीब वर्गों तक पहुंच बनाने का दावा करती है।
ऐसे में कांग्रेस का दलित अपमान वाला मुद्दा बीजेपी के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। बीजेपी की कोशिश होगी कि वह कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताए और अपने विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं के जरिए जवाब दे।
क्या कांग्रेस को मिलेगा फायदा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल मुद्दा उठाना काफी नहीं होगा, कांग्रेस को इसे जमीनी स्तर पर वोट में बदलने की चुनौती होगी। दलित समाज के बीच भरोसा कायम करना, संगठन मजबूत करना और स्थानीय नेतृत्व खड़ा करना पार्टी के लिए जरूरी होगा।
मल्लिकार्जुन खरगे खुद दलित समुदाय से आने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इसलिए पार्टी उनके मुद्दे को प्रतीकात्मक रूप से भी इस्तेमाल कर रही है। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और अधिकारों की लड़ाई के तौर पर पेश कर रही है।
आने वाले चुनावों में यह मुद्दा कितना असर डालता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस इसे कितनी मजबूती से जनता तक पहुंचा पाती है। फिलहाल इतना साफ है कि खरगे विवाद के जरिए कांग्रेस 2027 और 2029 दोनों चुनावों के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है।