नई दिल्ली। रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) से जुड़े करीब 40 हजार करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने बड़ी कार्रवाई की है। विशेष सीबीआई अदालत ने मामले में आरोपी वैशाली माने के खिलाफ खुला गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी करने का आदेश दिया है। विशेष न्यायाधीश अजय गुलाटी ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। ईडी ने वैशाली माने के खिलाफ पहले ही आरोपपत्र दाखिल कर दिया है, लेकिन अब तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। अदालत ने आरोपों की गंभीरता और जांच में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने की आवश्यकता को देखते हुए यह आदेश दिया है। यह आदेश मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को दिया गया, जिसकी खबर बुधवार, 14 अक्टूबर को सामने आई।
जानकारी के अनुसार, रिलायंस कम्युनिकेशंस और अनिल धीरूभाई अंबानी समूह से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में प्रवर्तन निदेशालय जांच कर रहा है। एजेंसी करीब 40 हजार करोड़ रुपये के ऋण और धन के कथित दुरुपयोग से जुड़े लेनदेन की पड़ताल कर रही है। इस मामले में कई लोगों की भूमिका जांच के दायरे में है। वैशाली माने का नाम भी ईडी की ओर से दाखिल आरोपपत्र में शामिल है।
विशेष न्यायाधीश अजय गुलाटी ने अपने आदेश में कहा कि अदालत ने मामले के रिकॉर्ड, जांच एजेंसी की दलीलों और आरोपों की प्रकृति तथा गंभीरता पर विचार किया है। इन परिस्थितियों में आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए खुला गैर-जमानती वारंट जारी करना उचित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वारंट तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक उसे निष्पादित नहीं कर लिया जाता या अदालत स्वयं उसे निरस्त नहीं कर देती।
अदालत ने जांच एजेंसी को यह भी निर्देश दिया है कि वह आरोपी के सत्यापित ठिकाने और वारंट के निष्पादन के लिए उठाए गए कदमों की रिपोर्ट पेश करे। मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है। इस दौरान जांच एजेंसी की रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा और आगे की न्यायिक कार्यवाही की जाएगी।
इस मामले में पहले भी वैशाली माने के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया जा चुका था। हालांकि, पूर्व में जारी वारंट को निष्पादित नहीं किया जा सका। इस संबंध में जांच एजेंसी ने अदालत के समक्ष स्थिति रिपोर्ट दाखिल की थी। रिपोर्ट के साथ पंचनामा भी प्रस्तुत किया गया था। इसके आधार पर अदालत ने मामले की परिस्थितियों की समीक्षा करते हुए खुला गैर-जमानती वारंट जारी करने का फैसला लिया।
ईडी की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, जब अधिकारी वैशाली माने के अंतिम ज्ञात पते पर पहुंचे, तो वहां उनकी मां मौजूद थीं। उन्होंने अधिकारियों को बताया कि वैशाली माने विवाह के बाद वर्ष 2015 से अमेरिका में रह रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वह आखिरी बार वर्ष 2021 में भारत आई थीं। इस जानकारी को भी अदालत के सामने रखा गया।
सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जोहेब हुसैन ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने बताया कि वैशाली माने को जांच में शामिल होने के लिए कई बार नोटिस और समन भेजे गए थे। इसके बावजूद वह जांच एजेंसी के सामने पेश नहीं हुईं। ईडी ने कहा कि आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए अदालत से खुला गैर-जमानती वारंट जारी करने का अनुरोध किया गया है।
जांच एजेंसी की ओर से अदालत को बताया गया कि वैशाली माने को उनके अंतिम ज्ञात पते के अलावा ईमेल और व्हाट्सऐप के माध्यम से भी नोटिस भेजे गए थे। इसके बावजूद उन्होंने जांच प्रक्रिया में भाग नहीं लिया। ईडी की दलीलों के अनुसार, लगातार समन जारी किए जाने के बाद भी आरोपी का उपस्थित नहीं होना मामले की जांच में बाधा बन रहा था।
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, इससे पहले 27 अप्रैल 2026 को भी वैशाली माने के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था। उस समय भी अदालत ने जांच में शामिल होने के लिए भेजे गए नोटिस और समन का पालन नहीं किए जाने को ध्यान में रखा था। इसके अतिरिक्त 19 फरवरी को जारी एक समन के माध्यम से उन्हें 2 मार्च को पेश होने के लिए कहा गया था। हालांकि, यह समन अस्वीकार किए जाने की रिपोर्ट के साथ वापस आया था।
रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े इस मामले में कंपनी के पूर्व निदेशक पुनीत नरेंद्र गर्ग भी जांच के दायरे में हैं। उन्हें जनवरी 2026 में प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था। इसके बाद से वह न्यायिक हिरासत में हैं। ईडी ने 27 मार्च 2026 को इस मामले में आरोपपत्र दाखिल किया था, जिसमें पुनीत गर्ग और वैशाली माने को आरोपी बनाया गया। जून में विशेष अदालत ने आरोपपत्र पर संज्ञान लिया था।
इस मामले में कथित रूप से बड़ी मात्रा में ऋण की राशि के इस्तेमाल और वित्तीय लेनदेन की जांच की जा रही है। ईडी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कंपनियों से जुड़े धन का प्रवाह किस प्रकार हुआ और क्या किसी रकम का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य से अलग किया गया था। जांच में वित्तीय दस्तावेजों, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और धन के स्रोतों की पड़ताल महत्वपूर्ण है।
कानूनी दृष्टि से गैर-जमानती वारंट जारी होना महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इसका उद्देश्य संबंधित आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है। हालांकि, किसी आरोपी के खिलाफ वारंट जारी होने या आरोपपत्र दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि उस पर लगाए गए आरोप सिद्ध हो चुके हैं। अंतिम निर्णय अदालत में पेश साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा।
फिलहाल वैशाली माने के खिलाफ खुला गैर-जमानती वारंट जारी होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय को उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी अदालत को देनी होगी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी। इस दौरान अदालत जांच एजेंसी की रिपोर्ट और वारंट के निष्पादन से जुड़ी स्थिति पर विचार करेगी।