नई दिल्ली: 'समाधान समारोह 2026' के तहत आयोजित सुप्रीम कोर्ट की तीन दिवसीय स्पेशल लोक अदालत 23 अगस्त को 1,712 मामलों के निपटारे के साथ संपन्न हुई। इनमें मध्यस्थता (mediation) के ज़रिए सुलझाए गए 48 मामले भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस तीन दिवसीय प्रक्रिया के दौरान कुल 3,285 मामले सूचीबद्ध किए गए थे, जिनमें से 1,664 मामलों का निपटारा लोक अदालत की बेंचों ने किया। इसके अलावा, मध्यस्थता के ज़रिए 48 और मामलों को सुलझाया गया, जिससे कुल निपटाए गए मामलों की संख्या 1,712 हो गई।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की देखरेख में शुरू की गई इस पहल का मकसद विवादों का मध्यस्थता, आपसी सहमति और सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान करना था।

समझौते से पहले की व्यवस्थित प्रक्रिया 21 अप्रैल, 2026 को शुरू हुई थी, जिसमें समझौते की संभावना वाले लंबित मामलों की पहचान की गई और वादियों तथा उनके वकीलों को सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने के लिए पहले ही शामिल किया गया।

स्पेशल लोक अदालत 21 से 23 अगस्त तक आयोजित की गई थी। पहले दिन 588 मामले सूचीबद्ध किए गए और 402 मामलों का निपटारा किया गया। 22 अगस्त को 1,159 मामले सूचीबद्ध किए गए, जिनमें से 350 का निपटारा हुआ, जबकि 23 अगस्त को 1,538 मामले सूचीबद्ध किए गए और 912 मामलों का निपटारा किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि जिन विवादों को सुलझाने के लिए लिया गया, उनमें वैवाहिक और संपत्ति से जुड़े मामले, मोटर दुर्घटना के दावे, भूमि अधिग्रहण और मुआवज़ा, कराधान (taxation), और सेवा व श्रम से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

तीन दिवसीय स्पेशल लोक अदालत के दौरान कुल 240.94 करोड़ रुपये के मामलों का निपटारा किया गया। कोर्ट ने यह भी बताया कि तीन दिवसीय लोक अदालत के दौरान सूचीबद्ध होने का इंतज़ार किए बिना ही 21 अप्रैल से 20 अगस्त के बीच कई मामलों का सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारा कर दिया गया था।

लोक अदालत की बेंचों की अध्यक्षता CJI ने की और इनमें सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड और अन्य अधिवक्ता शामिल थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के वरिष्ठ रजिस्ट्रार और अधिकारियों का सहयोग मिला। सुप्रीम कोर्ट ने अपने बयान में कहा कि इस पहल से आपसी सहमति से विवाद सुलझाने के फ़ायदे दिखे हैं। इससे लंबे समय तक चलने वाले मुक़दमों में लगने वाला समय और खर्च कम हुआ है, मुक़दमेबाज़ों को ज़्यादा निश्चितता और फ़ैसले के अंतिम होने का भरोसा मिला है, और लंबित मामलों की संख्या कम करने में मदद मिली है। साथ ही, इससे उन मामलों के लिए अदालती समय भी बचा है जिनमें फ़ैसले की ज़रूरत थी।

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